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तुमने कही देखा है मेरा बचपन...
तुमने कही देखा है मेरा बचपन...
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© Vishal Ajmera

Fantasy

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तुमने कहीं देखा है मेरा बचपन 

क्या तुमने कहीं देखा है मेरा बचपन..... 

वही गलियारे है 

वही सिकुड़ी -सी तंग गालियाँ । 

वही खेल का मैदान 

जहाँ दोस्ती बड़ी थी और कागज़ी नोटे छोटी । 

आज फिर उसी दहलीज़ पर खड़ा हूँ 

पर सब कुछ धुआँ- धुआँ सा है । 

गालियाँ वही, पर ज़िंदादिली गुम सी है 

नज़ारे वही, पर ज़िन्दगी गुमशुम सी है । 

किस्से है, पर ख़ामोशी की चादर ओढ़े 

सपने है, पर हताश हुए कही सोए । 

क्या तुमने कहीं देखा है मेरा बचपन..... 

गुजर गया वह काल है  

खोज रहा हूँ इन्ही गलियारों में कहीं

अधूरी बातों में कहीं, 

अकेली मुलाकातों में कहीं 

वही चंचल, नन्हा -सा बचपन । 

सब कुछ बिखरा - बिखरा सा है 

यक़ीनन फिर,

कोई तो होगा ।  

देखा होगा मेरा बचपन जिसने 

सजाकर रखी होंगी जिसने 

वक़्त की मासूमियत भरी दास्ताँ । 

 

क्या तुमने कहीं देखा है मेरा बचपन..... 

बचपन दहलीज़ यादें कागज़ के नाव तंग गलियां दोस्त मैदान खेल

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