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गर मुमकिन हो
गर मुमकिन हो
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© Anushree Goswami

Romance Tragedy

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गर मुमकिन हो मंज़िल न सही,

राह ही बन जाओ,

तुम मेरा कल न सही,

आज ही बन जाओ !


हाथों की लकीरों में,

छिपी है ख़ामियाँ कई,

उनके बदल जाने की,

आस ही बन जाओ !


मेरी भूली-बिसरी यादों में,

छिपे हुए दर्द हैं,

तुम मेरे कल की खूबसूरत,

याद ही बन जाओ !


खो चुका हूँ अपनी,

नादानियाँ कहीं पीछे,

तुम मेरी मासूमियत की,

पहचान ही बन जाओ !

आस मंज़िल याद

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