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विश्वास
विश्वास
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© Asha Pandey 'Taslim'

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सुनो?
हाँ कहो न?
चलो हम-तुम एक घर बनाते हैं
ठीक है चलो संग
मैं विश्वास की नींव रखती हूँ
और तुम यक़ीन की छत बनाना
सुनो न?
हाँ कहो न?
वो दरवाजे़ पर कौन खडा़ है?
कुछ पूछ रहा हूँ मैं तुमसे?
जवाब दो।
क्या कहूँ बोलो
क्या बताऊँ कहो
तुमने तो यक़ीन की छत बनायी थी न
तुम्हें ही नहीं पता?
प्यार के दरवाजे से कोई
आ तो नहीं सकता है न
यह यकीन की बात है
विश्वास का विषय।
सुनो
सुनो
दिमाग़ न लगाओ ज़्यादा अपना
तुम्हें क्या क्या पता है
और तुम क्या क्या समझाना चाहती हो
मैं जानता हूँ
खूब समझती हूँ
जब तुम जानते ही हो वह कौन है
दरवाजे़ पर कौन खडा़ है
तो पूछते ही क्यों हो भला
सुनो
अब सुनना बाकी नहीं रहा कुछ भी
जो मुझे होना था हो चुका
तुम्हारी तंग नज़री ने कर दिया बदजुबान
तुम्हें तो व्यंग्य की आदत सी पड़ी है न
कहते तो तुम्हीं हो सब
सुनती तो मैं ही हूँ सब
तुम क्यों शक का दीमक साटते फिरते हो
दरवाजे़ पर दरार तुमसी ही उभरी है
यकीन के दरवाजे पर यह ऐब तुमसे है
यकीन की वो छत अब तो रही नहीं
भरोसे की आँख तुमने खो दी है
यकीन के बगैर
इस बिन छत के घर में
मेरा अब दम घुटता है
जानते हो?
तुम्हें अब वो यक़ीन तो रहा नहीं
मेरे और तुम्हारे विश्वास के इस घर में
दीमक ही दीमक पसरा है
दरार ही दरार बिखरी हैं
सीलन ही सीलन मौजूद है।

 
 
 
 

यकीन रिश्ते एहसास घुटन

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