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बना रहा...
बना रहा...
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© Masum Modasvi

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दिल में हमारे आपसा अपना बना रहा, 
आँखें जगी रही नया सपना बना रहा ।
अपनी हयात में कोई हमसफ़र तो हो,
तुम मिल गये तो वस्ल का जज्बा बना रहा ।
वैसे धड़कते दिल में कई हसरतें रहीं, 
तेरे विसाल से मेरा बसना बना रहा।
चलती रहीं ये जिंदगी तन्हा जहान में, 
उनके करम से जीने का इमकान बना रहा।
आवाज तेरी गूँजती रस घोलती रही,
महफ़िल सजाता एक ये नगमा  बना रहा।
जीते रहे हैं गम से हम मासूम जुड़े हुये ,
खुशियों का फिर भी एक  सरापा बना रहा।

गज़ल। एहसास नगमा

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