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पुराना होता आदमी
पुराना होता आदमी
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© Dipak Mashal

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एक पुराना होता आदमी 
 
लेता है नमी सीलन भरी दीवारों से 
 
रद्दी अख़बारों से पूछता है पता 
 
गुज़रे ज़माने की मुस्कुराहट का  
 
चिड़ियों पर उछालता है खोखली हँसी 
 
घोंसलों पर ठूँठों पर खिलखिलाता है बीते दशकों पर 
 
ज्यों बड़ा दार्शनिक हुआ हो 
 
धीमी रफ़्तार वाली रंग उड़ी हुई कारों से 
 
करता है प्रतिस्पर्द्धा अपने विवाह के समय लिए पंखे से 
 
कमज़ोर पड़ती मसहरी से 
 
बचपन में रोपे गऐ पेड़ से 
 
कभी साइकिल की ढीली पड़ी बार-बार उतरती चेन से 
 
एक पुराना होता आदमी 
 
जो बूढ़ा नहीं हुआ था अभी पिछले सावन तक 
 
अचानक से खाने लगता है जंग 
 
ख़ुद को जानने लगता है कबाड़ 
 
आँकने लगता है मोल अपना 
 
पीली पड़ती तस्वीरों पर झुँझलाने लगता है 
 
बरस पड़ता है अपने आप पर 
 
एक पुराना होता आदमी 
 
होता है शर्मिन्दा बार-बार भूल जाने पर 
 
माँगता है क्षमा 
 
अपने अगले लहू से 
 
संकरित हो चुके अगले से अगले लहू से 
 
उसे याद नहीं रहती ज़रूरी समझी जाने वाली तारीखें 
 
तो कभी उतारता है खीझ गुज़री पीढ़ियों पर 
 
कम मीठी होती जलेबियों पर नाराज़ होता है 
 
करेले-नीमों के नाम करता है ताने 
 
भीगे-अंकुरित अनाजों से याद करता है स्वास्थ्य के बरस
 
एक पुराना होता आदमी 
 
करने लगता है तुलना  
 
घी गेहूँ सोने की क़ीमतों की 
 
उसके अपने समय से 
 
आज के पराऐ वक़्त की 
 
समय अपनी फैलती चादर में 
 
उसकी देह सिकोड़ता है 
 
तह करता है उसे सिलवटें छोड़ते हुऐ 
 
अस्सी-नब्बे-सौ के अंक की तरफ़ बढ़ती उम्र 
 
वापस खींचती है गिनती-पहाड़े पट्टी-बस्तों की स्मृतियों में 
 
फिर चुपके से 
 
शून्य से आरम्भ होकर 
 
एक दिन वो अनन्त होने लगता है 

पुराना होता आदमी

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