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हालात आजकल!
हालात आजकल!
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© Siddharth Gupta

Inspirational

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तोड़ देता हूँ मैं, वो आइना सोच का
ये निगाहें अब समय के उस पार झाँकने से डरती हैं।
जब समाचारों में पहलुओं से ज़्यादा आरोपों पे चर्चा होती है,
तो उगता सूरज भी किसी हुकूमत की चाल लगती है।

क्या डरना अब किसी और के हाथों मौत का,
यहाँ तो हवा के झोंके ही अंदर शरीर के घाव करते हैं।
अब तो ये झोंके भी खुद को आधुनिक हथियारों से लैस रखते हैं,
क्योंकि जब सिर्फ सियासत से दम नहीं घुटता,
तो खुद में थोड़ा ज़हर घोल लेते हैं।

समय की साजिश ऐसी कि सपना देखना भी अब बेईमानी लगता है,
जो सपना सुबह तक मेरा होता है वो शाम को नोटों में नपता है।
पतन की सुगबुगाहट निश्चित ही रहती है ऐसे मौकों पर,
ये पतन मेरे सपनो का होता है या उन नोटों का ये सिर्फ वक़्त को पता है।

ख़ाक साफ़ दिखता है भविष्य इस ज़माने का,
जहाँ नज़रें उठाने पर आसमां साफ़ नही दिखता।
कितना भी पोछ दो वो मटमैला ही रहता है,
चूँकि साफ़ कर रहा इंसान दहशत में है रहता।
बस इसीलिए तोड़ देता हूँ मैं वो आइना सोच का,
ये निगाहें अब समय के उस पार झाँकने से डरती हैं।।

वायु प्रदूषण विमुद्रिकरण राजनीति आरोप प्रत्यारोप।

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