Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
जितना जितना तुम बदलोगे
जितना जितना तुम बदलोगे
★★★★★

© Ankita kulshrestha

Abstract

1 Minutes   13.7K    6


Content Ranking

सांझ ढले जब रात नशीली लेती होगी अंगड़ाई.. 

और भी ज्यादा तन्हा होकर रोती होगी तन्हाई। 

जितना जितना तुम बदलोगे, उतना ही हम बदलेंगे.. 

या तो हमको शीशा समझो या तो अपनी परछाई।

एक तरफ तो कहते हैं वो जैसे हो वैसे रहना.. 

और कभी वो ही कह उठते क्या है तुम में अच्छाई। 

पानी जैसा अपना जीवन बह जाते मन-भावों में.. 

जैसे सांचे में रख दोगे वैसी होगी ढलवाई। 

हमने खुद को किया हवाले हमसे मत उम्मीद करो.. 

अब बस तुम पर ही ठहरी है इस रिश्ते की गहराई। 

यूं तो अपने सब स्वप्नों का हमने ही दम घोंटा है.. 

जी उठते हैं लेकिन वो सब चलती है जब पुरवाई। 

लोग यहां कहते छिप छिप कर हम को पागल आवारा.. 

रब ही जाने इन बातों में कितनी होगी सच्चाई। 

दुनिया वाले खुद जी चाहे वैसे रंग दिखाते हैं.. 

एक ज़रा बस इश्क़ किया तो कर देते हैं रुसवाई। 

आज अगर है मन अँधियारा असमंजस के बादल हैं.. 

फूल खिलेंगे कभी एक दिन महकेगी सब अँगनाई

 

परछाई पुरवाई सच्चाई

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..