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काव्यसृजन
काव्यसृजन
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

Others Comedy

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क्या शब्दजाल ही,कविता को साकार बनाना होता है ? 
भावशून्य शब्दों का बस,आकार बनाना होता है ?

भारतवर्ष जहाँ शब्दों को , ब्रम्ह समान बताया हो । 
महाकाव्य रचकर कवियों ने,काव्यज्ञान समझाया हो । 
पूजा स्थल तक कवियों के छंद , जहाँ पर रहते हों ।
देश जहाँ हम कवियों को ,सूरज से बढ़कर कहते हों ।

क्या केवल शब्दों को बुनकर, हम कवि बनने वाले हैं ? 
दिवस दुपहरी मात्र जानकर, हम रवि बनने वाले हैं ? 
काव्यदशा को देखो परखो , एक क्लेश रह जाता है । 
शून्य शून्य से मिलता केवल शून्य शेष रह जाता है ।

ब्रम्ह अंश का चित्त धरे हम , छंद सृजन जब करते हैं । 
स्वच्छंद कलम आवेशित कर, कविता में ज्वाला भरते हैं । 
शब्दों को मतिबिंब बनाते , नई विमाऐं गढ़ते है ।
‘महाकुशा’ जिसके उर मंडित,बस वो आगे बढ़ते हैं ।

ओजकवि विजय कुमार “विद्रोही” 
 

काव्यसृजन - ओजकवि विजय कुमार विद्रोही

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