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कबाड़ी
कबाड़ी
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© Udbhrant Sharma

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कबाड़ी शब्द सुनने में विचित्र लगता है

बोलने में भी

जब वह किसी इन्सान की

लेता है शक्ल

तो हमें उस पर आती करुणा,

हिकारत भी

उपेक्षा से उस पर एक

उड़ती नजर डाल

हम बढ़ जाते हैं

अपने-अपने दफ्तरों की ओर

कभी-कभी कोसते हुए

किसी तथाकथित ईश्वर को

जो महीने के अन्तिम सप्ताह में

हमें कबाड़ी की शक्ल में बदल देता

कभी-कभी बना देता भिखारी भी!

हमारे घरों की औरतें

नहीं होतीं हमारे जैसी मूर्ख

अपनी दुनियादारी को समझदारी

के पेंट से चमकातीं

कबाड़ी को सेठ का दर्जा देतीं

उसे इज्जत से देखती-बुलाती हैं

कबाड़ी की आवाज सुनते ही होतीं प्रसन्न

जैसे आ गया हो मायके से उनका भाई

और जो राखी बँधवाकर

रक्षा के वचन की जगह दे जाएगा

चन्द नोट!

हमारी बीवियां

जब देखती हैं कबाड़ी की शक्ल

तो जैसे किसी सम्मोहन के वशीभूत

उन्हें उसकी आँखें दिखतीं जामुन की तरह

नाक आलू-सी

मुँह टमाटर

और वे खुश होकर उसे मन ही मन असीसतीं

कल्पवृक्ष की तरह जिससे कभी

टपकता आम, कभी अमरूद, कभी केला,

भारी भरकम खरबूज और तरबूज भी,

यहाँ तक कि चाय और बस का टिकट तक!

इस हरिताभ सौन्दर्य के बीच

उन्हें जगह-जगह फैला

सृष्टि का कूड़ा लगता रासायनिक

खाद की तरह उपयोगी

और कबाड़ी की आकृति

वृहत् से वृहत्तर होती हुई

व्याप्त होती समूचे पर्यावरण में

ब्रह्म की तरह।

और जिसकी पुत्री की तरह

मन की वीणा को झंकृत करते हुए

वे अपनी दैनंदिन

कविता रचने और शाम को

दफ्तर से लौटे लस्त-पस्त

अपने-अपने पतियों को

कविता की जगह

कहानी सुनाने की

ललक से भरतीं

मायके से आये अपने ईश्वर को अगले महीने

के अन्तिम सप्ताह में आमन्त्रित करते उनकी

सूनी कलाइयों में बाँधने के लिए

एक अदद

राखी!

 

 

 

 

 

 

कबाड़ी

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