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चलता हूँ दो कदम
चलता हूँ दो कदम
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© आदित्य श्रीवास्तव

Drama Inspirational

1 Minutes   7.4K    19


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चलता हूँ दो कदम हमें,

चल के जाने तो दे,

ऐ जिंदगी खुद को भी,

ज़रा आज़माने तो दो।


डूबना ही मुक्क़दर है,

तो फ़िक्र ऐ फ़िज़ूल,

खुद जा के दरिया में,

हमें उतर जाने तो दे।


शाम तलक ही सही,

हम लौटेंगे ज़रूर ही,

इस मुसाफिर को ज़रा-सा,

भटक जाने तो दे।


सोचते है दो घड़ी को,

अब सुस्ता लें फ़िज़ूल,

कोई दो घड़ी को कुछ,

बीते हुए जमाने तो दे।


वो क्या है आसमां जो,

नाप ही न दिया जाए,

रुक जवाँ परिंदे को,

पंख ज़रा फैलाने तो दे।

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