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माँ ! मुझे बुला लो
माँ ! मुझे बुला लो
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© Pramila Verma

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अम्मा !

तुम तो कहती थीं
मैं जज बनूंगी
डंडा ठोंक ठोंक कर
ऑर्डर ऑर्डर करूंगी ।
लेकिन,
बरसो गुजर गए,
मेरे पैरों पर आकर कितने डंडे गिरे ।
मैं उस ऑर्डर के आगे -पीछे नाचती रही
ऑर्डर बोला -"उठ"
तो मैं उठ गई।    
ऑर्डर बोला- बैठ ! तो मैं बैठ गई।
आर्डर ने कहा -
बच्चे पैदा कर
तो मैंने बच्चे जने
ऑर्डर ने जब जो चाहा किया मैंने अम्मा !
तुम तो मेरी नन्ही हथेलियों को
अपने हाथों में लेकर
कहती थीं -
ऐसे कोमल हाथ मैंने न देखे ।
अब तुम्हारी लाडली  की कोमल हथेलियाँ
गाय - बछड़ों की सानी घोलती कंडे - उपले थापती
खुद मगर की खाल बन गई हैं।
कभी-कभी ऐसा लगता है अम्मा
कि दुआरे पर बैठी कुतिया नसीब वाली है।
अपने ऑर्डर के कहने पर उठती - बैठती नहीं
उसके पास आ जाने पर गुर्राती है।
तुम्हारी लाडली तो अम्मा !
गिरगिट की भांति सिर हिलाती है।
खूटे पर बंधी गाय की तरह
अपने नसीब को खली - भूसी में टटोलती है।
देखो तो अम्मा
कितने बरस बीत गए
अब उठने बैठने में घुटने चिलकते हैं ।
आंखों में कुछ पानी सा तैर जाता है
जब तुम्हारी याद आती है अम्मा !
बिटिया ब्याह गईं
लड़के अपनी चिरैया को लेकर
 सात समुंदर पार उड़ गए।
अब ऑर्डर देते घर में कोई नहीं
 मैं निपट अकेली अम्मा !
सखी सहेली भी हिरा गईं।
लेकिन क्या कभी उस भाई को
 मेरी याद नहीं आई
जिसको बाबू के सज़ा देने पर
 कोने में छुपकर रोटी मलाई खिलाती थी।
जिसकी परीक्षा में सारी रात जागकर
 दूध- गुड़   सेव के साथ देती थी।
अम्मा ! वो तो डंडा कहीं फटकारता होगा।
घर बाहर ऑर्डर - ऑर्डर करता होगा।
बाबू ने उस पर अपनी सारी कमाई लुटाई
सूखों से उसे भर दिया।
मैं भी ऑर्डर- ऑर्डर कर सकती थी।
तेरे आंखों के सपने को पूरा
 कर सकती थी अम्मा...
लेकिन तुम्हारी लाड़ली
गोबर -पानी -सानी
 के बीच सन कर रह गयी अम्मा 
अम्मा ! मै आना चाहती हूँ  अपने गांव
जहाँ  तुम हो अम्मा,
हर कोने ,चूल्हे के पास
गोबर लिपे आंगन में
गुनगुनाती तुम्हारी सांसे,
खेत-खलिहानों में तुम हो जीवित अम्मा !
तुम्हारे हाथों की मसालों की गंध महसूसने
अपनी आँखों  में आशा का अनंत विस्तार लिए,
तुम्हारी गोदी में सिर रखकर आंखें बंद करना चाहती हूं।उसी हरसिंगार के नीचे
जहाँ  तुम मेरी चोटी मैं फूल गूंथती थीं।
और
कहती थीं काजल का टीका लगा ले ।
किसी की नजर ना लगे ।
लेकिन
अम्मा! इन साठ सालों में न किसी ने नजर भऱ देखा
ना किसी की नजर लगी ।
मेरा गोरा रंग कारी कजरारी आंखें
अतीत बन गई।
मैं तो खुद काजल की रेखा बन गई अम्मा!
मैं सावन के झूले झूलना चाहती हूं अम्मा!
अपने पाँवों में पाजेब पहन कर
ठुनकना चाहती हूं ।
मुझे बुला लो अम्मा!
मुझे बुला लो अम्मा...।

#माँ

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