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© दयाल शरण

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खुद लिखिए रोज

यहाँ फिर खुद को

पढ़ा कीजे,

शहर अच्छा है,

जरा संभलके

कि आप शहर में हैं।


मुस्कुराने के

दाम मिल जाते हैं

फिर भी यहाँ,

जरा रोये कि

तमाशा है,

आप शहर में हैं।


भीड़ में खोजिये

खुद को और

साया आपको

खोजे,

धूप की छाँव है

परेशान

फिर आप शहर में हैं।


बहुत आसान है

फलसफा

जिन्दगी का,

मशहूर हों,

पर पाँव,

जमी पर रहे

कि आप शहर में हैं।


खरीदें खूब,

जब तलक जेब हो

भारी,

मगर यह रिश्ते हैं

बेमोल,

ऐ खरीददार

आप शहर में हैं।

कविता शहर ख़रीदे बेमोल रिश्ते

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