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आत्मबोध
आत्मबोध
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© Pratik Srivastav

Inspirational

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एक बगिया में था एक पंछी

कुछ अलग सा, था कुछ अतरंगी !


नीरव एकाकी उसको भाए

जाने क्यों वह हर सबसे घबराए !


सब करते उसका परिहास

हर पल छूटे उसकी आस !


सिखलाते उसे सब दुनियादारी

अलग ही समझे उसे बगिया सारी !


गलत सही में पड़ा अकेला

लगे बेगाना अपनों का मेला !


सब्र की सीमा टूटी उसकी

लगी ये बगिया झूठी उसकी !


उड़ चला वह बगिया से एक दिन

पंख फैलाये फिरता हर दिन !


घूमा तब वह क्यारी - क्यारी

तब पाया ये दुनिया है प्यारी !


देख इसे वह हुआ अचम्भित

पाया खुद में कुछ भी नहीं है कल्पित !


जिन बातों से रहता था हैरान

अब वही थी उसकी खुद की पहचान !


दे दिया निज जीवन को नया आकार

खुद से किया खुद का साक्षात्कार...।

Conscience Self motivated Confidence

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