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लफ़्ज-दर-लफ़्ज
लफ़्ज-दर-लफ़्ज
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© Dilbag Virk

Inspirational

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मेरा बोलना मुझे कितना महँगा पड़ा

मैं लफ़्ज-दर-लफ़्ज खोखला होता गया |

मैंने की थी जिनसे उम्मीद प्यार की

पैसा उनका ईमान था, पैसा उनका ख़ुदा |

दोस्त बाँट लेते हैं दर्द दोस्तों का 

देर हो चुकी थी जब तलक ये वहम उड़ा |

कुछ बातें ख़ुद ही देखनी होती हैं मगर 

मैं हवाओं से उनका रुख पूछता रहा |

 

उस किनारे पर तब गूंजें हैं कहकहे 

इस किनारे पर जब कोई तूफां उठा |

तन्हा होना ही था किसी-न-किसी मोड़ पर 

यूं तो कुछ दूर तक वो भी मेरे साथ चला |

तुम मेरी वफ़ाओं का हश्र न पूछो ' विर्क '

मेरा नाम हो गया है आजकल बेवफ़ा |

 

 

 

 

खोखला किनारे दोस्त

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