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ख़बरदार
ख़बरदार
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© Sharique Imbesat

Drama Abstract

2 Minutes   6.6K    2


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सुनसान पड़े संसार मेंं

उड़ चला देखो एक परिंदा 

ख़बर सुनाता डगर डगर

चाहे हो कोई बाशिंदा 

समाचार उसका नाम था

ख़बरें था वो पहुँचाता 

बिना सोचे बस बेधड़क 

बेबाक हर बात बतलाता

मालिक-ए-आवाम को

समाचार था बहुत जचता

जिसके ज़िक्र-ए-जहाँ से

लाखों का दिन बचता

 

तभी हुआ तख़्तापलट 

सरकार नई फिर आई

अब चील था उनका रब

समाचार ने ये बात फैलाई

क्या पता था समाचार को 

आवाम पे थी परछाई

ख़बरे जहाँ दे रहा था वो

वहाँ भरी थी कड़वाई 

आक़ा-ए-आवाम ने

फिर नई बात फ़रमाई

काट दो परिंदे के पर

उसने ख़बर गलत फैलाई

पर उस परिन्दे की क्या थी गलती

उसने तो कही थी सच्चाई

गरुड़ के गंदे इरादों को

आवाम समझ बैठी अच्छाई

फिर क्या था, उस परिन्दे के

सारे परों को दिया काट

वो पर नहींं पैग़ाम थे

जो पहल करते हर पात

 

अब समाचार बिना आवाम मे

काली होने लगी हर रात

काली दुनिया, काले बादल 

हर गली मेंं फैला था अंधकार

भटक भटक सब भय मे

भूल गऐ भगवान

चील ही उनका राजा था

चील ही उनका चाँद

फिर बाज़ ने बर्बादी का

ऐसा बुना मायाजाल

बेफ़िक्र सब सो रहे थे

तब टूटा भय का बाँध

 

हर शाख पे उल्लू बैठा था

हर मोड़ पे था शैतान

लाशों की लड़ी लगी थी

लंबी हुई हर रात

समाचार सरकार की लड़ाई मेंं

अवाम बनी शमशान 

हर चिता पे चील बैठा था

वादी मे चीख रही थी उसकी चाल

और इस तरह एक समाचार 

का मरना, ले गया सबकी जान 

 

Free speech fable goverment

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