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'बहनापा'
'बहनापा'
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© Arpan Kumar

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बाल्टी कहती है
रस्सी से
डूबकर गहरे कुएँ में
हर बार
बाहर निकलती हूँ
तुम्हारे सहारे
जुड़ी रहकर तुमसे
तुम्हारा बंधन ही
आख़िर मेरा बचाव है
अपनी वेणी के
आलिंगन-पाश में भरकर
बड़े ही प्यार से
रस्सी जवाब देती है
धीरे से
बाल्टी को…
गहराई, कालिमा
अपशकुन, फिसलन
हर तरह के संशय, जोखिम
को चीरती साहसपूर्वक
तुम उतरती हो
किसी कुएँ के
सोते, सघन जल की
अलसायी, गहरायी
तंद्रा को
भंग करने
उसकी सतह पर
छपाक से
हलचल उठाती भरपूर
अपने पदाघात से
और डूबकर स्वयं
सर्वप्रथम
तुम लाती हो
अपने साथ भरकर
ताजा, मीठा जल
किसी की तपती, विनीत
अँजुली के निमित्त
तुम्हारे साहस को
मैं सिर्फ खींचती हूँ
दोनों ही अनभिज्ञ हैं
कदाचित
एक-दूसरे के प्रति
अपने बहनापे से...

'किसने क्या किया' की भावना से मुक्त रहने का संदेश देती कविता...

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