Kanchan Jharkhande

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सदाबहार माँ की भूमिका

सदाबहार माँ की भूमिका

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माँ को अर्पित

बन्द कमरे के किसी कोने से 

आते उजाले सी हैं माँ

सुखी मिट्टी पर गिरे पानी की 

सोंधी खुशबू सी हैं माँ


कभी बरसात में केले के पत्ते से

भीगने से बचाती जैसी माँ

सच कहूँ तो

सर्दी के मौसम में रोटी के ऊपर

कच्चे आम की चटनी सी हैं माँ


कड़क धूप में किसी खण्डर के 

बाज़ू रखे शीतल मटके सी हैं माँ

कभी सुख हैं कभी खुशी 

कभी हँसी हैं कभी जिंदगी हैं माँ

कभी उत्साह कभी शांति कभी हिम्मत, 


तो कभी बन्दगी हैं माँ

कभी रोपण कभी अर्पण

कभी समर्पण सी हैं माँ

ममता की मूरत तो कभी

स्वर्ग की दर्पण हैं माँ


कभी सुबह कभी सांझ

कभी दिन कभी रात सी हैं माँ

कभी भूमि कभी पृथ्वी कभी प्रकृति 

तो कभी एक शब्द मात्र सी हैं "माँ"


कभी बंजर धरती पर

अकस्मात उगे बीज सी हैं माँ

तो कभी माटी का दीया, 

कभी चौका कभी तीज़ सी हैं माँ।


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