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एहसास
एहसास
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© Vineeta A Kumar

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बदला हुआ लगता है

हर मंज़र इस बार

सरसों है पीली ज्यादा

या फागुन है अधिक

गुलाबी इस बार

 

पतझड़ के सूखे पत्तों

की सरसराहट में

सुनाई दे रहा

कोई प्रेमगीत इस बार

 

हरियाली भरे

मदमस्त सावन में

फुहारें भी कुछ

ज्यादा ठंडी इस बार

 

कोई नई कहानी

सुना गई कोयल की

कूक इस बार

 

मन का हिरण

कुलाँचे भर रहा जब-तब

बढ़ती धड़कन के साथ

अधरों का मुस्कुराना  इस बार

 

न जाने ये सब

किसके  हैं आसार ?

लगता है कहीं से

चुपके से           

छू लिया मुझे

तुमने इस बार!

 

कविता फागुन तुम

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