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ख्वाहिशें...
ख्वाहिशें...
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© Pratik Srivastav

Inspirational

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यूं ही टटोलने बैठा था बीते वक्त को आज तो पाया


जैसे सूखे पड़े दरख़्त की अब काई भी उखड़ने लगी है


पर ये अलहदा - सी ख्वाहिशें अब भी पांव पसारे बैठी हैं


तिमिर का प्रतीक बने इन पुरानी यादों को अब


मानो क्षितिज से उगते सूरज से कुछ और भी उम्मीदें जगी हैं...।।

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