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मेरी आग़ोश में आ ,ख़ुद को बिखर जाने दे ।
मेरी आग़ोश में आ ,ख़ुद को बिखर जाने दे ।
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© Ashok Goyal

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मेरी आग़ोश में आ ख़ुद को बिखर जाने दे।
अब ये लम्हा मेरी बाँहों में ठहर जाने दे।   
मुन्तज़िर हूँ मैं, कभी वक़्ते मसर्रत होगा।
ये बुरा वक़्त है, ये वक़्त गुज़र जाने दे।
यूँ तो मुमकिन नहीं ताउम्र रिहाई इसकी ।
मुन्तज़िर होगा कोई,चाँद को घर जाने दे ।
हर किसी का यहाँ अंजाम मुक़र्रर है अगर।
जिसको जाना है जिधर, उसको उधर जाने दे।
बाद मुद्दत के अभी लौटे हैं दिल के मौसम।
आज की शब तो मुहब्बत को सँवर जाने दे।

आग़ोश मुन्तज़िर चाँद

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