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 वो भयानक रात
वो भयानक रात
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© Samta Joshi

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कितनी भयानक थी वो रात ,
उसकी इज़्ज़त की , जब निकली बारात  
एक हैवान , उसके शरीर को खा रहा था 
उसकी बेबस चीखों से ,अपनी भूख मिटा रहा था 
किसी दीमक की तरह , वो उसे जकड़े हुए था 
स्वाभिमान को उसके , पैरों तले पकड़े हुए था 
अपनी पूरी ज़ान लगाकर ,वो मदद को चिल्लाई 
पर तमाशाबीन लोगों को ,कोई आवाज़ तक ना आई 
उसकी चीखों को ,वो अपनी हँसी से नोंच रहे थे
वहाँ खड़े-खड़े , बस अपनी बारी की सोच रहे थे 
 
इन सब के बाद , जब वो बैठी रो रही थी 
पूरी दुनिया ,चैन की नींद सो रही थी 
फिर से किसी पर विश्वास, वो कर नहीं पा रही थी 
धीरे - धीरे लोगों से ,बस कटती चली जा रही थी 
अपनी व्यथा ,वो किसी को सुना नहीं पाई  
अरसा हो गया ,उसके चहरे पर कोई हँसी तक ना आई 
लोगों को उसका, बदला रंग नज़र आ रहा था,
पर इन सबका कारण , कोई समझ ना पा रहा था 
मुस्कुराहट पर उसकी ,मिट्टी सी ज़म गई  
उसकी ज़िंदगी तो बस , उसी दिन थम गई  
 
समय लगा उसे ,पर अब वो सँभलने लगी 
धीरे ही सही, उस अंधेरे से अब उभरने लगी 
उस रात की यादें , उसे फिर भी सताती 
पर उसकी हिम्मत को ,अब हिला ना पाती 
अपने अंदर के डर को ,उसने अपनों को बतलाया 
उन शैतानों को पकड़वाकर , खुद को इंसाफ़ दिलाया 
हाँ , समय लगा उसे पर वो समझ गई 
कि लड़की होना ,कोई ग़लती नहीं 
बिखरे हुए सपनों को ,वो फिर से बुन लेना चाहती थी 
एक नन्हा सा परिंदा बनकर ,आज आसमान में उड़ना चाहती थी 
आसमान में उड़ना चाहती थी ......................

शोषण भयानक रात नयी दिशा नयी सोच

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