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विस्थापन
विस्थापन
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© Udbhrant Sharma

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अब हम

बसाएँगे बस्तियाँ

चाँद पर

फिर मंगल पर

फिर शायद शुक्र पर!

मानव अब

वामन की तरह

मानव अब

वामन की तरह

बढ़ा रहा अपने तीन डग

बढ़ा रहा अपने तीन डग

एक-एक कर

इस ब्रह्माण्ड में!

पृथ्वी अब

गौण होती जा रही

उसके लिए

कहाँ तक विचार करे

उसकी समस्याओं पर!

पृथ्वी तो बेवकूफ-

भावुक माँ की तरह।

चिन्ता करती है हर समय

निर्धन, असहाय,

भूखे, नंगे,

शोषित, पीड़ित

लोगों की

जिनके पास

सिर छुपाने को

नहीं छत अब तक

और जिनके पास अपने घर थे

उन्हें विस्थापित देख

उसकी छाती दरक उठती

जब देखती अबोला दुख उनका

माता के गर्भ से

विस्थापित होते समय

शिशु ने जो कातर भरी चीख़

वह फैल गई शनैः-शनैः

जीवन के दीर्घ पटल पर

पूरी तरह से

उसी चीख़ को

हर्षोन्माद में बदलने

यह बुद्धिमान

ईश्वर की तरह सर्वशक्तिमान मानव यह

पृथ्वी माँ के दुःख-दर्द की उपेक्षा कर

अन्तरिक्ष में मानव-बस्तियाँ बसाने के

उपक्रम में व्यस्त

पृथ्वी से लेते

सायास

अपना निष्कासन

विस्थापित करते हुए

अपने भ्रूण को

उसके गर्भ से

विस्थापन

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