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मुसाफ़िर
मुसाफ़िर
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© Sanjeev Singh Sagar

Comedy

1 Minutes   13.8K    6


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गली-गली, शहर-शहर, 

चलता गया वो बेखब।

कभी ईधर, कभी उधर, 

भटकता गया वो डगर-डगर।

 

अजीब धुन को लिए, 

पार किया नदी-नहर।

ना रुका कभी, ना झुका कभी, 

बैठा कहीं न दो पहर।

 

उड़ता गया वो लहर-लहर, 

कभी इस नगर, कभी उस नगर।

बनके परवाना बेखबर, 

रखी कभी ना अपनी खबर।

 

संभल-संभल कर आ गया, 

वो अपनी मंज़िल पा गया।

हर ठोकर हार गया, 

उसका सपना जीत गया।

मिलती है सफलता उनको हौसलों में उङान होती है । उङते तो कौए भी हैं पर वे बाज नहीं बन पाते हैं ।

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