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दो साये (सदृश्य रचना)
दो साये (सदृश्य रचना)
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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सुनसान दोपहरी को मैं निकला शहर के चौक पर ।

दो अजनबी सायों ने तब देखा ठिठक कर,चौंक कर ।

आँख में थोड़ी शरम थोड़ा सा डर दिखने लगा ।

एक साया दूसरे की आड़ में छिपने लगा ।

मैंने बेतरतीब लहज़े मे कहा तुम कौन हो ।

इतने भीषण गर्म मौसम में खड़े हो मौन हो ।

एक साये ने कटोरा मेरे आगे कर दिया ।

मानों जैसे राष्ट्र के मुख पर तमाचा जड़ दिया ।

 

एक साया 10 बरस का एक साया 6 बरस ।

कोई भी इंसान इन पर कैसे ना खाता तरस ।

वो वेदना के शब्द जिनमें अनकही सी आह थी ।

जेठ के दिन के रवि की सारी किरनें स्याह थीं ।

सिर्फ रोटी की ज़रूरत ने उन्हें ये बल दिया ।

एक साया दूसरे रस्ते पे आगे चल दिया ।

पगतली जलती हुई नंगा बदन अंजान का ।

प्रश्नसूचक सा था वो इस देश के अभिमान का ।

 

पीछे बहना एक झोला सा लिये चलने लगी ।

इन विवशता के क्षणों में हाथ वो मलने लगी ।

चेहरे पे मासूमियत थी आँख में थोड़ी शरम ।

काश कोई जान ले इन आत्माओं का मरम ।

लड़खड़ा कर एक साया जब ज़मीं पर गिर पड़ा ।

देखता रह गया मैं एक छाँव के नीचे खड़ा ।

तब बहन ने फिर सड़क पर भाई को पुचकारकर ।

दे सहारा जब उठाया राह में पग काँपकर ।

 

एक ट्रेक्टर मौत सा फिर आ गया था दौड़कर ।

रख दिये हैवान ने दोनों खिलौने तोड़कर ।

देखने वाला समूचा दृश्य सारा मैं ही था ।

एक लज्जा के तले जो दब रहा था मैं ही था ।

है अगर ये  हाल तो जल जाऐंगीं गलियाँ सभी ।

औ वतन के इस चमन की कोंपलें,कलियाँ सभी ।

गिरिराज से उस हिंद तक हर एक बचपन गाऐगा ।

ये “आदमी”  जिस रोज़ करुणाभाव उर में लाऐगा ।

 

दो साये (सदृश्य कविता ) - ओजकवि विजय कुमार विद्रोही

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