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 धरती बनी भिखारन
धरती बनी भिखारन
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© Atul Balaghati

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भीख में तूझसे माँग रही हूँ
सबका जीवन दान
बनी भिखारन तेरे दर पे
दया करो घन श्याम ।
^^^
गरज-गरज कभी ऐसे बरसे
बिछा दिया जल-जाल
कभी उड़ गये संग पवन के
तहाँ उड़ती रज-गुलाल
कितने झुलसे सूर्य तपन से
कितने डूबे मकान ।

बनी भिखारन तेरे दर पे
दया करो घन श्याम ।।
^^^
भरो न इतनी गागर मेरी
जो छलकत-छलकत जाय
भीग रहा है तन- बदन
मन प्यासा न रह जाय
सारे दर्द मैं पी लूँगी, पर
बच्चों का रखो ध्यान ।

बनी भिखारन तेरे दर पे
दया करो घन श्याम ।।
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(अतुल बालाघाटी)

अतुल

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