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मुझको ये तुमसे कहना था
मुझको ये तुमसे कहना था
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© Ankur Govind

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मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था |

पतझड़ के झड़ते पत्तों को ,
डाली से फिर कब जुड़ना था । 
सावन की झड़ती बूँदोंं को,
बादल से फिर कब मिलना था ।

सागर की उठती लहरों को ,
तट पर आकर कब रुकना था । 
जीवन के पथरीले पथ पर ,
ये हाथ पकड़ कर कब चलना था ।

मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था ।

तेरे बढ़ते इन कदमोंं को ,
पीछे मुड़कर कब रुकना था | 
सूरज की ढलती किरणों को ,
अम्बर में ही क्यों मिलना था |

मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था

कल -कल बहते इन झरनो को ,
नीचे गिरकर कब उठना था | 
खिलते फूलों की कलियों को ,
मुरझाकर ही क्यों गिरना था |

शायद मेरी ही गलती थी ,निश्छलता का दुःख सहना था | 
मुझको ये तुमसे कहना था,
कह ना पाया चुप रहना था |

time enemy nature desire emotions transition change

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