Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
घड़ी
घड़ी
★★★★★

© Arti Tiwari

Inspirational

1 Minutes   14.0K    7


Content Ranking

वो पिता की घड़ी थी

चांदी सी चमकती चेन में मढ़ी थी

घड़ी की भी एक कहानी थी

सुनी पिता की ही जुबानी थी

वे कहते

कभी दो सेकंड भी

आगे पीछे नही हुई

जबसे खरीदी है

सदा नई है

उनकी घडी का ये फलसफा था

घड़ी वो

जो बीस रूपये में ली हो

टाइम ठीक बताती हो

बिना रसीद की हो

हम विभोर हो सुनते

घड़ी को छूकर गौरान्वित होते

पिता चौबीस घण्टे में

एक बार चाबी भरते

और घड़ी सदा टिकटिक करती रहती

मुस्तैदी से

घड़ी ने निकाल दी

एक पूरी उम्र

बिना नागा,सुबह चार बजे जगा देती

उसकी सुइयों पर

दौड़ता था वक़्त

पिता कभी नही हुए किसी काम में लेट

वे अपनी घड़ी के

घण्टे वाले कांटे को अतीत कहते

जो मिनटों पर थिरकता

वही उनका वर्तमान था

और साइड बार के छोटे से कांटे को

वे बड़ी आशान्वित निगाहों से देखते

और उनके सपनों में

वो बड़ा हो जाता

उन्होंने नही की कोई शिकायत

कभी घण्टे वाले कांटे से

जिसकी चाह थी

क्यों नही मिला वो

वे साइड बार को भी साइड में ही रखते

कहते अपेक्षा मत करो

और भागते हुए मिनट वाले कांटे को

जीते रहे हर पल

उनकी घड़ी बड़ी विश्वसनीय थी

#positiveindia

पिता स्मृति सकारत्मक क्रांति

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..