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नई  दुल्हन
नई दुल्हन
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© Ashish Aggarwal

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कभी तो समझेंगें वो मुझे, बस इसी सब्र में ही,

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

नऐ  घर में कुछ नऐ  ख़्वाब लेकर आई थी मैं,

क्या अधूरे रह जाऐंगे उनकी अगर-मगर में ही।

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

घर के काम खत्म करते दिन से रात हो जाती,

क्या अब सुकून मिलेगा मुझे जाकर कब्र में ही।

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

वो मुझसे नहीं सिर्फ़ मेरे जिस्म से प्यार करते,

क्या वो जीवन साथी हैं मेरे केवल बिस्तर में ही।

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

मैं दहेज़ में ये नहीं लाई मैं दहेज़ में वो नहीं लाई,

क्या घूमती रहूँगी उमरभर तानों के नगर में ही।

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

टूट जाऐंगे मेरे माता-पिता मेरी ये हालत जानकार,

ख़ुदा करे इस घर की बात रहे बस इस घर में ही|

 

क्या बची ज़िन्दगी कटेगी मेरी रसोई-घर में ही।

 

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