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सफर
सफर
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© Raman Sharma

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रविवार का दिन है
बसों का आना जाना कम था ,
कुछ पलों का सफर था
नासमझ सा मिजाज था,
निकल पड़ा मैं मुसाफिर बनकर
खालीपन छाया था सड़क पर ,
कोई नहीं , कोई भी नहीं था
उस मंजिल की ओर जाने बाला ,
बक्त अपनी गति से चलता रहा
मैं भी कदमों को आगे बढ़ाता रहा ,
साथ साथ चलते बृक्ष,सर्द हवा
कर रहे थे आपसी रिश्ते को पूरा ,
अचानक भंयकर सी ध्वनि सुनाई पड़ी
ध्वनि मोटर वाहन की थी ,
इशारा किया हाथ से पागल की तरह
ऐसा लगा था जैसे हमसफर मिल गया ,
वाहन में सवार होकर चल पड़ा सफर तय करने
पहुँचाया दिया मंजिल तक मुझे गाड़ी वाले ने ,
उतरकर सामने हलवाई की दुकान थी
भाई साहब को एक कप चाय का आर्डर दिया ,
ठंड से नाक वह रही थी टांगें लड़खडा़ रही थीं
गर्मा गर्म चाय पीने से सर्दी का गुमनाम हो गया ,
घर वालों के फोन , कहाँ पर पहुंचा
उत्तर दिया दूर नही पास ही है रमन आपका ,

नासमझ मिजाज मुसाफिर

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