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याद
याद
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© Bhavna Bhatt

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याद तेरी
कीड़े की तरह रेंगने लगती है
मेरी नस-नस में
चूस लेती है खून के कतरे-कतरे को
और छाती पर बैठकर
धूप सेंकती है
 
याद तेरी
आ जाती है मुफ़लिसी के लीबास में
मांग लेती है मेरा चैन और सुकून
फिर मुझे कफ़न में ढक कर  
बादशाहों सी नाचने लगती है
 
याद तेरी 
बड़े नापाक इरादों से
घुस जाती है मेरे गले में 
मेरी सांसो की गति को घोंटती 
मुझे डुबोती है अश्कों के सागर में
और खुद चैन की सांसे भरने लगती है
 
याद तेरी
ग्रह की भांति खिंचती है मुझे गहरे समंदर में
और मैं वो गज की तरह
मदद की गुहार लिए
तुम आ जाओ कृष्ण 
सुना है कि
तुम शरणागत वत्सल हो !!

कविता याद

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