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हम तेरी कठपुतलियां रब्बा
हम तेरी कठपुतलियां रब्बा
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© Ashish Aggarwal

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हम तेरी कठपुतलियों की तरह, जैसे मर्ज़ी तू चलाई जा,

चाहे फूलों पर बिठा दे रब्बा चाहे अंगारों पर नचाई जा|

रंगीन करके चाहे फिर संगीन कर दे हमें दी ज़िन्दगी,

नाटककार की तरह अपने हिसाब से नाटक रचाई जा|

 

हमारे हर कदम की डोर तेरे हाथों में ही है साइयां,

चाहे संभाल ले अपनी उंगलियों से चाहे गिराई जा|

 

खेल खिलाने के बाद इनाम से भी तुमने ही नवाज़ना,

चाहे दिया भी वापिस ले ले चाहे रहमतें बरसाई जा|

 

कभी अच्छे किरदारों से मिलवाता तो कभी बुरों से,

चाहे दिलों में मोहब्बतें पैदा कर चाहे उनसे लड़ाई जा|

 

कर्मों के लिबाज़ भी तू पहनाता हालातों के हिसाब से,

चाहे मैला कर दे दामन चाहे मखमल में सजाई जा|

 

तू खत्म कर सकता है ये मजहबों के मीलों फासले,

अपने रंगमंच पर चाहे सुकून चाहे खून बहाई जा|

 

सबने अपनी समझ के हिसाब से तुझे भी बाँट लिया,

 

खुद आकर अपनी हकीकत बता चाहे सबसे छुपाई जा|

Kathputlian

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