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भारतीय किसान
भारतीय किसान
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© Acharya Shilak Ram

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भारतीय किसान

किसान बचे बिन भारत बचे नहीं, यह नियम है अटूट ।

दुर्गति इसकी कई सदी पुरानी, क्योंकि शिकार यह फूट ।।1

पैंसठ प्रतिशत आबादी भारत, खेतीबाड़ी बस काम ।

सीधे-साधे सरल चित् सुनो, रहें बिना किसी तामझाम ।।2

भारतीय अर्थव्यवस्था रीढ़े ये, कब समझेगी यह सरकार ।

किसान के ही पीछे सभी पड़े हैं, शोषित वह प्रत्येक प्रकार ।।3

अन्य सभी वर्ग खुशहाल हैं, छोड़कर केवल किसान ।

लाभ कहीं न कहीं कमा ही लेते, अल्पांश से व्यवधान ।।4

किसान का जीवन नरक बना, पग-पग पर इसका शोषण ।

सर्वाधिक मेहनती होने पर भी; गंवार, देहती दोषारोपण ।।5

किसी भी पल कोई चैन नहीं है, केवल यहां पर किसान ।

धन, दौलत, इसकी अस्मिता लूटने को, बने हैं सभी शैतान ।।6

सर्दी, गर्मी, बरसात हो, कैसा भी मुश्किल मौसम ।

कड़ी मेहनत से किसान हटे न पीछे, हँसता रहे झमाझम ।।7

किसान की ड्यूटी चैबीस घण्टे, कौन दुनिया में ऐसा व्यवसाय ।

फिर पल्ले नहीं फूटी कौड़ी, हर स्थिति यह असहाय ।।8

लोकतान्त्रिक या साम्यवादी हों, फासीवादी या राष्ट्रवादी ।

सैक्यूलर कहे जाने वालों ने, किसान गुलाम कीमत बतला दी ।।9।

सबने अपना काम ही निकाला, किसान से करके वायदे ।

हित किसी ने न देखा किसान का, सबने देखे अपने फायदे ।।10

किसान आज भी गुलाम भारत में, सात दशक हुए व्यतीत ।

सुध नहीं ली किसी ने इसकी, हार मिली सदैव-नहीं जीत ।।11

नेता, धर्मगुरु, उद्योगपति सुनो, दुश्मन किसान के व्यापारी ।

बेसहरा बनाकर रखा किसान को, सदैव कोड़े पड़े सरकारी ।।12

स्वार्थ साधन हेतु सभी लगे हैं, मौका केवल नहीं किसान ।

सरकारें इसकी दुश्मन सदैव से, मदद भी न करता भगवान ।।13

हाड़तोड़ मेहनत के बदले में, भर नहीं पाता किसान का पेट ।

चहुंदिशि बर्बादी इस हेतु है, होना निश्चित मटियामेट ।।14

पौष्टिक भोजन भी पहुंच से दूर, नहीं पहनने को उचित कपड़े  ।

चिकित्सा व शिक्षा की नहीं व्यवस्था, फंसा रहता कोर्ट के झगड़े ।।15

खेतीबाड़ी बनी मौत किसान की, सीमा पर उसका सैनिक-पुत्र ।

इनसे भलि तो उनकी भी जिंदगी, उठाते हैं जो मलमूत्र ।।16

क्रांति-व्रंाति बात दूर की, खाने-पीने के पड़े हैं लाले ।

बंधुआ मजदूर सभी समझें इसको, फिर कोइ क्यों इसे संभाले  ।।17

अपने हिस्से का लाभ मिलता सबको, किसान ही क्यों है वंचित ।

किसान दबा है कर्ज के नीचे, अन्यों के पास दौलत है संचित ।।18

सरकार, संगठन, उपदेशक सुनो; धर्मगुरु भी दुश्मन किसान ।

किसान संगठन भी दुश्मन इसके, सब समझें इसे नादान ।।19

सबसे मेहनती होने पर भी, किसान के हिस्से क्यों गरीबी ।

दूर-दूर सब हटते किसान से, कोई नहीं इसका करीबी ।।20

सर्वाधिक शोषण सात दशक में, हुआ है सुनो किसान ।

यह तो बर्बाद होता ही आया है, बर्बाद है इसकी संतान ।।21

लाभ किसान को होना न चाहिए, सुन लो एक आन्ने का ।

समुद्र में चाहे पड़े फेंकना धन-दौलत, नियम यह जमाने का ।।22

सभी दलों की सरकारों ने, धोखा दिया है किसान को ।

असहाय था-बर्बाद है सुनो, खोया है मान-सम्मान को ।।23

जिसको देखो विरोधी किसान का, इसको मूर्ख बतलाए ।

मौका मिला जिसको भी यहां पर, किसान के घाव दहलाए ।।24

सरकार, संविधान किसान विरोधी; व्यवस्था किसान विरोधी ।

काल बनकर यह उभर सकता है, बन जाए यदि यह प्रबोधी ।।25

षडयन्त्र ऐसे चल रहे हैं, खेती को छोड़ दे यह करना ।

मल्टीनैशनल कम्पनियां छीने जमीन को, शुरू हुआ इनका उभरना ।।26

अब तक सबका प्रयास यही रहा, किसान पड़ा रहे नरक में ।

दो सदी का अध्ययन परख लो, न लगता यह तथ्य फर्क में ।।27

जागना ही एकमात्र चिकित्सा, संगठन बने मजबूत ।

खेती से लाभ इतना मिल सकता, सम्पत्ति एकत्र अकूत ।।28

किसान अपनी फसल खुद ही बेचे, मंडियों में जा-जाकर ।

दलाल रहे नहीं कोई मध्य में, सारा लाभ रहेगा फिर आकर ।।29

किसान को एक रूपया मिलता है, दस कमाते हैं दलाल ।

ऐसे में उद्धार हो कैसे किसान का, रहेगा सदैव वह कंगाल ।।30

कीमत भी खुद अंकित करे, सीधे उपभोक्ता को बेचे सामान ।

पांच वर्ष में मालामाल हो जाए, सुनो भारतवर्ष का किसान ।।31

 -आचार्य शीलक राम

किसान अर्थव्यवस्था शोषण गंवार देहती धन दौलत

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