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रिश्ता...
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© Jagdish Raut

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तुम वादों से मुकर्रर नहीं

हमने बेतहाशा प्यार किया

पाना था मंजिले-ए-जानिब

सजदे सौ बार किया...

न मिलते तुम हमें

संगीत-ए-रौनक न होती

अब मिले हो तो

महफिलों में जिक्र बेशुमार किया...

के इसतरह न मुंह फेरकर बैठो

कलेजे में छेदों को राह मिलती है

हमने तो अपना कलेजा

आपके कलेजे के

कब का आरपार किया....

 

कविता

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