Audio

Forum

Read

Contests

Language


Write

Sign in
Wohoo!,
Dear user,
तुम्हारा प्रेम
तुम्हारा प्रेम
★★★★★

© Arti Tiwari

Others

1 Minutes   6.7K    1


Content Ranking

तुम्हारा प्रेम वैसे ही समाता गया मेरे वजूद में

जाड़ों की गुनगुनी धूप समाती है काया की ठिठुरन में

अपनी तमाम असहमतियों और नापसन्दगियों के बावज़ूद

आते गए करीब बेखबर से हम एक दूजे को इत्तला किये बगैर

मन होते गए एक दूध में घुली मिस्री की तरह

मेरे तुम्हारे भिन्न परिवेश

कभी आये नहीं आड़े

मैं नही बना पाती मक्के की रोटी और अफीम की भाजी

तुम नही खा सकते दाल चावल रोज़

भुला दिए हमने जाने कब के ये निरर्थक मसले

मौसमों के मिजाज़ बदलते रहे हम होते गए निकटतम

पता भी नही चला मेरी सारी दोस्तियाँ लिंगभेद से परे

जैसे सहज हैं तुम्हारे लिए मेरे लिए वर्णभेद से इतर

तुम्हारी इच्छाएँ महत्वपूर्ण जीवन के हर क्षण को

आनन्द से जीते भुला दीं परेशानियाँ

मौलश्री के फूलों सी झरती रही

हमारी संयुक्त हँसी घर के आँगन में

रिश्तों की सघन बुनावट को जीते

अहम भूलकर करते रहे मान

अपने पराये का

तुम्हारे रोपे पौधे को सींचती रही मैं

किसी भी प्रतिदान की आकांक्षाओं से परे

तुम एक प्रकाश स्तम्भ से थामे मेरी बाहें

अंधेरों से बचाकर हर बार ले आते किनारों पर

जहाँ बुनते रहे मेरे शब्द हमारे प्रेम की कविता सदियों से

 

तुम्हारा प्रेम

Rate the content


Originality
Flow
Language
Cover design

Comments

Post

Some text some message..