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© दयाल शरण

Drama Fantasy

1 Minutes   6.6K    8


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कुछ खामोश सा

यह शहर

मुझे कचोटता है

लेकिन वह बरसों

मुझ संग खिल-खिलाता था ।


होली दिवाली मनाता था

दाना पानी क्या उठा

शहर का मुझसे

मन ही उठ गया ।


सुबह जब ट्रेन से उतरा

कोई जल्दी नहीं थी

आफिस जाने की

खाना बनाने की

क्या पहनूं तय करने की ।


बस एक ही चीज तय थी

खाली बर्तन भाड़े बांधना है

वह मकान जिसमे मेरा घर था

उसे छोडना है

वापस लौटना है

अपने मस्तूल पर ।


धीरे-धीरे शाम ढलेगी

जिन्दगी भी उसी तरह

खुद को सिमेट लेगी

सब कुछ मेरे दिमाग पर

रह जाएगा

कुछ पन्नों की तरह ।


बरसना, भींगना,

पसीने में नहाना,

सर्द रातों में ठिठुरना

फिर एक कहानी का

ख़त्म होना ।

क्या जिन्दगी यहीं

रुक जायेगी ?


नहीं तो,

किरदार जाते हैं

कहानी चलती रहती है ।

हमेशा की तरह

शहर भी कुछ नए परिंदों को

समेट लेगा, अपने में

फिर ठंड, गर्मी और बरसात

अपनी बिसात बिछायेंगी

सतत.....अविरल ।

कविता मुक्त कविता रचना

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