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लड़कियां धरती होती
लड़कियां धरती होती
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© Kapil Jain

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लड़कियां धरती होती,

सब सहन करती,

देह से बेख़बर एक पूरी की पूरी दुनिया होती है।

लड़कियां उसकी देह में

बहती है नदी, बहते हैं नाले,

पूरी देह में उतार-चढ़ाव

कटाव-छंटाव के साथ उभरे हैं

तमाम पर्वत-पहाड़ टीले-मैदान

और घुमावदार टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ,

जिनसे होकर गुज़रती हैं

उसकी देह की हवाएँ।

वह हवाओं को रोक

बनाती है अनुकूल वातावरण

बरसने के लिए।

बावजूद वह रौंदी जाती है,

कुचली-मसली जाती है,

फिर भी बेमौसम बेपरवाह उग जाती है,

कभी भी कहीं भी बढ़ाती है,

अपनी लताएँ उगाती है,

अपने पौधे सहेजती है,

बाग-उपवन बनती है।

जंगल बनती है हवा बनती है

वज़ह जीवन के संचालन की।

छोड़ दो उसे सुनसान टापू पर

या छोड़ दो उसे निर्जन पथ पर

बसा लेगी औरत एक पूरी की पूरी दुनिया

अपनी देह की मिट्टी से कभी भी कहीं भी।

लड़कियां धरती होती

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