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रात है गहरी गहरी
रात है गहरी गहरी
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© Anima Das

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रात है गहरी गहरी......:

ये रात है क्यों गहरी गहरी 
आँसू है आँखों में ठहरी ठहरी ।

लम्हों की बारात चली है दम से 
कुछ कहानियाँ भरी है ग़म से ।

नींद के तारें ताक रहे हैं 
अरमाँ सारे मचल रहे हैं ।

कभी सोच की पंख, उड़ते बादल 
कभी पलकों की पत्ती, भीगी आँचल ।

बँट जाता है मन दो हिस्सों में 
एक टुकड़ा तू और एक टुकड़ा मैं ।

कुछ तो कहती है काली रात 
बड़ी अनसुनी मायूस बात 
चाह कर भी तेरे परछाई से ना पूछा पता 
सुनी खिड़की से आहिस्ता गुज़रा अँधेरा ।

आँखों में कब से गीली नींद की परत जम गयी ।
गालों पर तपती किरणों की निशान बन गयी । 
खुली खिड़की से अब नीला रंग 
कोहरे में सिमट गया
ख़ामोशी की दो बूँद पलकों पर छिड़क गया ।

 

रात है गहरी गहरी......:

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