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© Nikitasha Kaur

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स्त्रियों तुम्हें आगे बढ़ना चाहिऐ ।
शहर हो गाँव  हो  तुम्हे लड़ना चाहिऐ 
छिप रहें है पुरुष  बहानो के मुखोटों के बीच
सावधान, सावधान, अगला हमला
कोई अपना ही करेगा ।
वहशी हुआ है आदम, एक बार फिर से छलेगा ।
मत कहो ख़ुद को ''औरत"
इस शब्द से दासता की बू आती है,
करो वक्र दृष्टी, खींचो खडग । मारो,
मारो, मारो,  जान से मारो
ले लो सिर्फ़ एक बलि । हाँ नर बलि
किसी भी एक नरपिशाच की ।
दीप जलाऊँ, मैं वारी जाऊँ ।
दुर्गा बनो, चंडी बनो,
अभिषेक करूँ, तिलक  करूँ
ख़ुद अपने रक्त से ।

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