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मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ
मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ
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© Ravi Kumar

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बिके देश की मर्यादा जब ,

लहू उबल पड़ता है

शोले धधकते सीने में ,

सैलाब फूट सा पड़ता है,

लो कलम में अपनी मैं ,

तेज़ाब भर के लिखता हूँ

मेरे प्यारे देश ,

मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ |

खड़े हैं चारों तरफ,

आज़ादी बेचने वाले

अट्ठहास लगा रहे अब,

लोकतंत्र को नोचने वाले

शहीद हुऐ बेटों की ,

क़सम अब मैं लिखता हूँ

मेरे प्यारे देश ,

मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ |

जब जब तू कलंकित होगा ,

मौन नहीं रहूँगा

अब कलम मेरी शोले उगलेंगे ,

दहकूँगा "रवि " सा अब ||

सवा सौ करोड़ के अरमानों का ,

होगा ख़ून अब माफ़ नहीं

उनके मासूम जज़बातों का ,

होगा अब इन्साफ यहीं

उनके सुप्त गुस्से की ,

उबाल अब मैं लिखता हूँ

 

मेरे प्यारे देश ,

मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ |

होते रोज़ घोटाले देख ,

ख़ून नहीं किसका खौलेगा ?

 अब मौन के फाटक टूटेंगे ,

हम शंख पाञ्चजन्य फूकेंगें

क्रान्ति के स्फुलिंग का ,

उद्घोष अब मैं लिखता हूँ

मेरे प्यारे देश ,

मैं नई क्रान्ति लिखता हूँ | 

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