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दीप
दीप
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© Sunita Maheshwari

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अमावस्या की काली रात

है सघन अन्धकार अपार|

मचल उठे कुछ नव दीये

उत्सर्ग का अमृत पिये|

 

पल-पल तिल-तिल जलते|

निज प्राण उत्सर्ग करते|

हटाने को गहन तिमिर|

करने को प्रकाश स्थिर|

 

श्री राम के स्वागतार्थ,

लक्ष्मी-गणेश के पूजनार्थ 

हर घर, आँगन सजाने को, 

प्रेम, आनंद बढ़ाने को|

 

दीपों की है अपार शक्ति|

तम-जय की अद्भुत भक्ति|

भर देती ऊर्जा जन-जन में|

पुरुषार्थ जगाती तन-मन में|

 

अमावस्या की सजती रात|

ज़मीं पर तारे करते बात|

ज्योतिर्मय पर्व दीपावाली| 

 

सद्भाव जगाये दीपावाली| 

दीपावली

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