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चंदा से तुम
चंदा से तुम
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© लीना चंदर

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खुद को निहारूँ मंत्रमुग्ध-सी

खुद पर ही रीझूं बार-बार

जब दर्पण में नज़र आते हो तुम

खुद से शर्माऊं शर्मीली-सी

खुद पर इतराऊं बार-बार

जब अंतस में उतर जाते हो तुम

रोक न पाऊं चंचल हिरणी-सी

मन ही मन मचलूं बार-बार

जब अलकों में ठहर जाते हो तुम

हवा संग मैं डोलूं खुशबू-सी

मंद-मंद मुस्काऊं बार-बार

जब ख्यालों में कभी आते हो तुम

निखरी मैं जैसे भई चांदनी

तुममें मैं सिमटूं बार-बार

जब चंदा से नज़र आते हो तुम

किसी के प्यार में खोकर जो शब्द प्यार से लिखे जाते हैं वो कविता बन जाते हैं सच में चंदा से हैं वो

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