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लम्हों से अक्सर मैं बातें करता हूँ
लम्हों से अक्सर मैं बातें करता हूँ
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© Nikhil Sharma

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लम्हों से अक्सर मैं बातें करता हूँ 
तेरे संग बिताऐ पल, संग मैं रखता हूँ
तेरी  हँसी की कशिश, मेरे मन में बसती है 
तेरी पलकें झुक के उठे, बहारें करवट बदलती हैं 
तू जो रूठे तो, मौसम पतझड़ लगते है 
ऐसा है आलम अब 
तनहा भी रहूँ मैं जब, तुझमें ही रहता हूँ
लम्हों से अक्सर मैं बातें करता हूँ

ओस की पहली बूँद, पत्ति पे गिरी हो जब 
तेरे चेहरे को, रब ने सादगी दी होगी तब
तेरी एक झलक से ही दिन बन जाता है 
तेरा एहसास है कुछ ऐसा, तू छू दे तो मेरे गीत को साज़ मिल जाता है 
कुछ ऐसा काबू है, मेरे वक़्त पे अब तेरा
हर पहर मैं अब, तुझे सोच बिताता हूँ
तस्वीर लिए आँखों में, जाने कहाँ खो जाता हूँ 
कुछ इस तरह तेरा इंतेज़ार मैं करता हूँ 
लम्हों से अक्सर मैं बातें करता हूँ

यह फिजाऐं  भी मुझसे शर्माती हैं
यह हवाऐं  भी ऐसे इतराती हैं 
तेरी जुम्बिश लेकर यह बहने लगती है 
मेरी ख़्वाहिश के संग जो मिलती हैं
हर ज़र्रा फिर मदहोश हो जाता है 
तू गुज़रे जब करीब से, ये दिल ख़ामोश हो जाता है 
कुछ इस कदर मैं, फिर सुधर जाता हूँ 
तेरे क़दमों संग मैं अपनी राह बनाता हूँ 
कुछ इस तरह मैं वक़्त से ज़िक्र करता हूँ 
की हर लम्हे से बस तेरी बातें करता हूँ

 

mausam khamosh lamhe

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