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सपने में सौत
सपने में सौत
★★★★★

© Arpan Kumar

Romance

2 Minutes   7.0K    8


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मेरी पत्नी ने

लगातार दो रातों में

दो सपने देखे

उसके चैन उड़ा दे

ऐसे डरावने देखे

एक में देखा

मेरी दूसरी पत्नी उसके पास आई है

और उससे अपने दैनिक ख़र्चे के

वाज़िब पैसे माँग रही है

वह बेहद टूटी हुई और उदास है

मुझसे नाराज़ और ख़ुद से निराश है

मेरी पत्नी को उस पर कोई रहम नहीं आया

उलटे उसे ही ख़ूब खरा खरा सुनाया

'तुम कौन हो

जो मेरा हक़ छीनने आई हो

मुझसे मेरा सुहाग चुराने आई हो

इनके पैसे तो हमारे लिए ही कम पड़ते हैं

हरदम कर्जे में ही रहते हैं

फिर तुम्हें कहाँ से देंगे!'

वह लाख समझाती रही

सुबकती रही

मगर मेरी पत्नी ने उसकी एक न सुनी

ख़ाली हाथ आई थी

ख़ाली हाथ वह चली गई

अगले दिन मेरी पत्नी ने

फिर वही सपना देखा

सपने में मुझे

अपने से दूर जाते देखा

मगर इस बार सपने में वहाँ

उसने एक अल्ट्रा मॉडर्न लड़की को देखा

जो किसी बड़े घर की बेटी है

अपने ख़ानदान की अकेली संतान है

अपनी पुश्तैनी कंपनी की सीईओ है

उसी कंपनी की

जिसमें मैं काम करता हूँ

वह मुझ पर डोरे डाल रही है

मुझे महँगे-महँगे गिफ्ट देकर

अपनी ओर खींचना चाह रही है

मेरे परिवार को

रख-रखाव के दुगने पैसे देकर

मुझे अपने पास रखना चाहती है

मेरी पत्नी वहाँ भी लड़ बैठती है

'हमारे पैसे इतने कम भी नहीं कि

आप मेरे पति को खरीद लें

मेरे पति आपके यहाँ काम करते हैं

आप उनकी बॉस होंगी

उनके दिल पर मगर

आपका कोई राज नहीं हो सकता

क्योंकि उनके दिल की रानी मैं हूँ।'

इन दोनों सपनों को मेरी पत्नी ने

मुझसे शेयर किया

मुझे हिदायत दी

'अगर किसी और की ओर देखेंगे भी

तो मैं आपकी आँखें फोड़ दूँगी।'

मैं सोचता हूँ

प्रेम क्या है

प्रेम में एकाधिकार

और हिंसा क्या है

प्रेम कैसे

एक दयालु स्त्री को निर्दयी

एक कमजोर दिखती

स्त्री को सबल

और एक घरेलू स्त्री को

हिंसक बना देता है

प्रेम कैसे एक स्त्री से

उसकी स्त्रियोचित भावनाएँ

छीन लेता है

प्रेम उसे कैसे

इतना मज़बूत और

एकांगी बना देता है

कि वह सपने में भी

सिर्फ़ अपना दृष्टिकोण

देखती है

प्रेम में वह साझेदारी

नहीं कर सकती

सपने में भी नहीं

सपनों की ये दो सौतें भी उसे

कई दिनों तक परेशान

करती रहीं

उसकी बसी बसाई

गृहस्थी को

हैरान करती रहीं

मुझसे कितने तरह के

उसने वचन लिए

मायके और ससुराल

जाने कहाँ कहाँ

उसने फोन किए

रसोई में कई दिनों तक

उसका जी नहीं लगा

बीच बीच मे

हमारे बीच अनायास

कोई अबोला आ पसरता

बेक़सूर होकर भी

मैं अपनी सफ़ाई देता रहा

कभी उसकी तो

कभी अपनी कसमें

खाता रहा

मुस्कुराता हुआ

मैं उस मानिनी की

हर बात मानता रहा

मगर मन ही मन

दुआ करता रहा

उसे ऐसे सपने रोज़ आएँ

इस बहाने मुझे

प्रेम के अलग अलग रंग

देखने को मिलेंगे

हमारे बीच प्रेम की

आतुरता बढ़ेगी

वह मेरा खेल मगर

ज़ल्द ही समझ गई

एक दिन कहने लगी

'सपनों की ये सौतें मुझे

कुछ हानि पहुंचाए

या न पहुंचाए

आपको फ़ायदा ज़रूर

पहुँचा रही है।'

हम दोनों खिलखिला पड़े

यह खिलखिलाहट सपने में नहीं

हक़ीक़त में थी।

#love

पत्नी स्त्री सबल निर्बल

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