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लहूलुहान हूँ मैं
लहूलुहान हूँ मैं
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© Amit Mall

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लहूलुहान हूँ मैं
घायल आत्मा है
चीत्कार तड़प रही है
धरती से आसमान तक
किन्तु मैं हारा नहीं हूँ

फूटती है बिजलियाँ
कंपकंपाते हैं बाजू
टूट गए हैं तूणीर
धूल धूसरित हो गयी हैं आशाएं
किन्तु धड़क रहा हूँ
और धड़कूँगा इसी तरह।

ऐ वक़्त के खुदाओं
नहीं ले रहा हूँ दम
जीत रहा हूँ थकन
सी रहा हूँ ज़ख्म

लौटूंगा!
लौटूंगा!
जुझूँगा, इसी समर में

लहूलुहान हूँ मैं अमित कुमार मल्ल

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