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कभी-कभी
कभी-कभी
★★★★★

© Ekta Doshi

Romance

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खेल लेती हूँ कभी-कभी अल्फ़ाज़ से,

पर कुछ जज़बात है, कुछ खास है जो

खामोश-खामोश रहते हैं,

मना लेती हूँ कभी-कभी सब को प्यार से,

पर कुछ हालात हैं, कुछ अहसास हैं,

जो रूठे-रूठे से रहते हैं,

बचा लेती हूँ कभी-कभी खुद को उठते सैलाब से,

पर कुछ दिल के हिस्से हैं,

कुछ किस्से है जो भीगे-भीगे से रहते हैं,

मिल लेती हूँ कभी-कभी नींद मैं उस शख्स से,

पर कुछ सपने है, कुछ अपने है जो अधूरे-अधूरे से रहते हैं।

अल्फ़ाज़ ज़ज़बात सैलाब

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