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अभिमन्यु के वंशज
अभिमन्यु के वंशज
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© Kavi Vijay Kumar Vidrohi

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भूल गऐ क्या ? जब अभिमन्यु युद्धक्षेत्र में आऐ थे ।

वीरों ने ,अतिवीरों तक ने , नाकों चने चबाऐ थे ।

चंद्रदेव के पुत्र मोह से, अंशमात्र जीवन पाया ।

और देह में अपनी माँ के, वो अर्जुन नंदन आया ।

  •  

गर्भकाल में श्रवणशक्ति ने, चक्रव्यूह का ज्ञान दिया ।

कुरुक्षेत्र में जिसने, अतिरथियों के सम सम्मान दिया ।

भीष्म,द्रोण स्तब्ध खड़े सुन, अभिमन्यु के गर्जन को ।

देख रहे थे मौन धरे ,  अर्जुनसुत  के यश अर्जन को ।

  •  

चक्रव्यूह  के  सब द्वारों  पे ,दस्तक  देकर  आये  थे ।

गुरु द्रोण जिसकी रचना कर,मन ही मन हर्षाऐ थे ।

दुर्योधन की भीषण सेना का,मान भंग कर डाला था ।

चक्रव्यूह के छ: द्वारों को,खंड खंड कर डाला था ।

  •  

ज्येष्ठ,वृद्ध, अतिवीर,रथी तब स्वार्थ के फंदे झूल गऐ ।

बालक वध के लिऐ ,युद्ध के मापदंड सब  भूल गऐ ।

लगता जयद्रथ वंशज हो,जो रणभूमि में शेष  बचे ।

वो कायर जिनके मानों के,ना कोई  अवशेष बचे ।

काव्यलोक को  कुरुक्षेत्र  जो मान रहे , धिक्कार नहीं ।

पर पुन: जयद्रथ बनने का है , इन्हें शेष  अधिकार नहीं ।

काव्यजगत के वीरों तुम, अभिमन्यु को स्वीकार करो ।

हिंदी मधुबन के नवपुष्पों का ना, तुम प्रतिकार करो ।

  •  

जो वृक्ष किसी नवकोंपल के,आने खुश ना होता है ।

चिरपतझड़ सा जीवन थामे ,पूरी आयु में  रोता है 

ये युद्ध नहीं ये भक्ति है, सब सरस्वती के बेटे हैं ।

ये सब भी दौड़ लगाऐंगे,तत्काल समय जो लेटे हैं ।

  •  

ये करवट लेंगे , फिर बैठेंगेफिर ये चलने पाऐंगे ।

ये ही काव्यसंरक्षक माँ हिंदी का मान बढ़ाऐंगे ।

मेरी पीढ़ी जब आहत हो , मैं शब्ददंश दिखलाता हूँ ।

शायद इस अवगुण से ही मैं , “विद्रोहीकहलाता हूँ ।

रचनाकार -कवि विजय कुमार विद्रोही 

अभिमन्यु के वंशज - ओजकवि विजय कुमार विद्रोही

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