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ख़ुद से कहीं दूर
ख़ुद से कहीं दूर
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© Mohanjeet Kukreja

Classics

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गले लगना तो दूर की बात, एक-दूजे से हाथ नहीं मिलता;

बचपन की तरह गुफ़्तुगू को अब अपना साथ नहीं मिलता...


अब कुछ पूछ भी लूँ गर, दिल से कोई जवाब नहीं मिलता;

कोई दिलासा... वो पहले सा, बढ़ा हुआ हाथ नहीं मिलता...


बेग़ानों को तो ख़ैर फ़ितरतन, ताउम्र बेग़ाना ही रहना था;

शिक़ायत अपने साये से है जो अब मेरे साथ नहीं मिलता...


अपनी बर्बादियों का ग़ालिबन ज़िम्मेदार ख़ुद मैं ही था;

मेरे टूट कर बिखरने में किसी का भी हाथ नहीं मिलता...


गोया उम्र के साथ-साथ कहीं, ख़ुद से दूर हो गए हैं शायद;

अपना ही पता नहीं मिलता, अपना ही साथ नहीं मिलता...


---


गुफ़्तुगू: बात-चीत; फ़ितरतन: आदत अनुसार; ताउम्र: पूरी ज़िन्दगी; ग़ालिबन: शायद; गोया: जैसे

गुफ़्तुगू ताउम्र दिलासा

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