वो लावारिस नहीं
वो लावारिस नहीं
मिस चेतना अपने पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करते-करते कब प्रौढ़ावस्था में कदम रखीं उन्हें अहसास ही नहीं हुआ।
माँ के गुजरने के बाद मायके की गृहस्थी का एक एक कोना माँ बन कर सजाया। माथे पर उभर आई लकीरें गवाह बन चुकी थी उनके संघर्ष की।
भाभीयां भी अपनी दीदी पर जान छिड़कती थीं। पापा को दीदी के भरोसे छोड़कर दोनों भाई अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए।
माँ के जाने के बाद कब चेतना ने माँ की जगह ले ली इसका होश नहीं रहा। पापा गाहे-बगाहे चेतना पर शादी का दबाव डालते, पर चेतना आज तक घर जंवाई ढूँढ़ती रही पर नहीं मिला।
सफल दाम्पत्य जीवन में दो-दो पिता एक साथ एक छत के नीचे रहेंगे इस बात पर लड़के वालों को घोर आपत्ति रहती।
इसी उधेड़बुन में पापा का स्वर्गवास हो गया। उम्र और अकेलेपन से चेतना परेशान रहने लगी। आये दिन अखबारों में बृद्ध और नि:सहाय की हत्या की खबर पढ़कर चेतना थोड़ा डरने भी लगी। अपने डर पर काबू पाने के लिए एक अच्छे वृद्धाश्रम में रहने चली गई। भाई और भाभीयों ने कभी खोज-खबर नहीं ली, पापा के मरने के बाद भी नहीं।
चेतना स्वयं ही अपने नये ठिकाने की जानकारी देना उचित नहीं समझी। समय बिताने के लिए अब कभी अपने पेज कभी पर्सनल ब्लॉग पर लिखने लगी।
दिन भर ढेरों शुभकामनाएं और बधाइयाँ आती, चेतना के अंदर जीने की उमंग फिर परवान चढ़ने लगा। वह मित्रों के संग जुड़ने लगी, विचारों के आदान प्रदान में वक्त अच्छी तरह बीतने लगा।
एक दिन वृद्धाश्रम की केयर टेकर आई और बोली “चेतना जी आपका बेटा आपसे मिलने आया है।"
चेतना को लगा शायद किसी तरह पता ठिकाना पूछ कर भाई आया है मिलने ;अररे ! यह तो कोई किशोर है।
वह पैर छूकर आशीर्वाद मांगा” माँ जन्मदिन की ढेरों शुभकामनाएं।"
चेतना सवालिया नज़रों से देखने लगी वह लड़का बोला, "इंटर का रिजल्ट खराब हो गया था और मैं सुसाइड करने का मन बना चुका था तभी आपके पेज पर आपकी लिखी कहानी पढ़ी।"
"कहानी का सारांश बस यही था कि असफलता कभी भी बुजदिल हमें नहीं बनाती है, बल्कि कानों में कहती है और श्रम की आवश्यकता है सफलता सुनिश्चित है।"
"आपकी उन्हीं बातों को याद करते हुए मैनें आत्महत्या के विचार त्याग दिये। और आज मेरा चयन आई .आई . टी में हो गया है।"
"चूंकि मेरे प्रतिशत ज्यादा थे तो मैंने जिस विषय में फेल हुआ था उसमें शिक्षा विभाग को पेपर चैलेंज का आवेदन दिया, और फिर मैं सफल हुआ।
माँ आपकी बातों से मुझे फिर से जीने की प्रेरणा मिली। पुनः जीवनदायिनी माँ के जन्मदिन की बधाई।
चेतना आश्चर्य चकित हो कर पूछ बैठी; "आपको कैसे पता कि आज मेरा जन्मदिन है ?"
ये गूगल और फेसबुक हर किसी का जन्मदिन खास बना देते हैं।"
चेतना झुक कर उसे गले लगाते हुए बोली, "बेटा रिश्तों की डोर में आपने मुझे बाँधा है चूँकि आपने मुझे माँ कहा है तो एक वादा करो कभी भी जीवन के किसी मोड़ पर रिश्ते को बंधन मत समझना, तभी मैं तेरे हाथ से मुँह मीठा करुँगी।"
"हाँ माँ एक वादा आप भी करें, आप हमेशा लिखती रहेंगी, जिस दिन आपकी लेखनी रुकेगी, मैं सारी ज़िम्मेदारी और कर्मों को छोड़कर आपके पास दौड़ा चला आऊँगा।"
"ठीक है बेटा मैं ज़रूर वादा निभाऊँगी, हर इंसान के दिल में प्यार का झरना होता है, अपनी प्यारी प्यारी कथा के माध्यम से प्यार जगाती रहूँगी।
पूरे वृद्धाश्रम में खूब धूमधाम से चेतना का जन्मदिन मना कर किशोर लौट गया।
चेतना आज अत्यधिक खुश थी वह हमेशा अपने बढ़ते उम्र में स्वयं को दिलासे देती थी। 'एकला चलो रेएए' गुरुदेव की पंक्तियाँ गुनगुनाते रहती। उम्र के अंतिम पड़ाव में कमर झुकने लगी थी। सहारे के लिए प्यार की छड़ी जो किशोर के रुप में पा ली थी। आँखों से आँसू बह निकले, बिना सांसारिक झमेलों के वह माँ जो बन गई थी।
