Hilal Saeed

Drama


4.0  

Hilal Saeed

Drama


वह रात

वह रात

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शायद मैंने थोड़ा बदला है खुद को शायद थोड़ा बदलना अभी बाकी है फिर उस बदली हुई सोच से खुद से बदला लेने का इरादा है।

खुद से इतनी मेंुहब्बत हो गई है अब मेंुझे की अब खुदसे मेंिलना बस खुद ही मेंें सिमेंटे रहना ख्वाहिश में आ चुका है।

दूसरा अंधेरा जो मेंुझे शायद ही मेंुझे समेंझ आया होता अगर उन आंसुओ में मेंेरी खामेंोशी ना सिमेंटी होती ।

य अंधेरा जो आपसे आपकी परछाई तक छीन लेता है और इस कदर तन्हाई का एहसास कराता है कि आप मेंजबूर होते हो खुद से मेंिलने खुदको तलाश करने के लिए।

एक शायद य भी वजह रही है कि अधेरे में में हमेंशा खुद से मेला हूं अब तो शायद अक्सर ही ऐसा हो जाता है हफ्तों में दो एक बार अब खुदको चाहने का, समझने का, सुनने का व खुद से सवाल जवाब करने का इससे अच्छा वक्त क्या ही होता होगा।

यह वक़्त यह लम्हा अक्सर नहीं आता जो आज में तन्हा ना जाने क्यों जाग रहा हूं खामोशी से खामोशी को सुन रहा हूं इरादा तो मैंने सोने का किया था मगर नींद भी शायद अब मेरी नहीं रही उसको भी शायद किसी और से में मुहब्बत होने लगी है अब बुलाना जों पड़ता है इसको हर दफा।

खैर..

अब खामोशी को सुनना अच्छा लगने लगा है जिससे में पहले खौफ खाया करता था।

कमेंरे का मेरे दरवाज़ा पूरा बंद किया भी इस तरह से है कि कुछ रोशनी आती हुई दिखाई दे रही है में तन्हा सा चुप हूं ना जाने क्यों बस करवटें बदल ने के सिवा कुछ बचा ही नहीं है फिलहाल कभी इधर नजर जाती है तो कभी उधर सब कुछ तो देखा हुए है कमेंरे में मगर फिर भी मेरी नज़रे बार बार ना जाने क्या ढूंढ रही है।

नींद को बुलाता हूं कभी उसका ख्याल सताता है पल पल कभी खुद से तो कभी इस दिल से में नाराज़ हो रहा हूं और नाराजगी भी एसी जो पल भर के लिए होती है जैसा शायद मुहब्बत में पहले कभी किया होगा हमेंने, और अब पल भर से ज़्यादा इस दिल से और खुद से कैसे रूठुंगा कोई खुद से कब तक जुदा रह सकता है, सबसे रूठने की रस्में पूरी कर चुका हूँ में अब और नहीं।


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