वड़वानल - 27

वड़वानल - 27

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‘‘सर,  मैंने  काफी  ठोस  सबूत  इकट्ठे  कर  लिये  हैं। क्या आज दत्त को आपके सामने लाया जा सकता है ?’’   रावत कमाण्डर किंग से पूछ रहा था।

‘‘तुम इकट्ठा किये गए सबूत मेरे पास ले आओ। मैं उन पर एक नज़र डालकर निर्णय लूँगा।’’   किंग   ने   कहा।

रावत के जाने के बाद किंग बेचैनी से अपने चेम्बर में चक्कर लगा रहा था।

‘क्या  दत्त  के  केस  का  निर्णय  मुझे  लेना  चाहिए,  या  इस ज़िम्मेदारी को अपने वरिष्ठ अधिकारियों  को  सौंप  दूँ ?  क्या एडमिरल रॉटरे को इस बारे में सूचित करना चाहिए ?’’   किंग   सोच   रहा   था।

‘इस सबके पीछे दत्त अकेला नहीं है। नि:सन्देह एक गुट इस बेस में विद्यमान होगा। इस गुट को बाहर के क्रान्तिकारियों का समर्थन प्राप्त हो रहा होगा, वरना इतने  बड़े  पैमाने  पर  इन  पोस्टर्स  को  बेस  में  तैयार  करना  सम्भव  नहीं  है।  इन पोस्टर्स की भाषा––– इन्हें जरूर बाहर से समर्थन मिल रहा है। जल्दबाजी करने से कोई फ़ायदा नहीं है।’

वह कुर्सी पर बैठ गया। अचूक कौन–सी कार्रवाई करनी चाहिए, उसकी समझ में नहीं आ रहा था। पानी का पूरा गिलास पीकर उसने बची–खुची चार बूँदें अपनी आँखों पर लगाईं, कुछ आराम महसूस हुआ। वह कुछ देर उसी तरह कुर्सी पर बैठा रहा।

‘‘बशीरऽ, बशीरऽ’’ उसने कॉक्सन को बुलाया। बशीर अदब से भीतर आया।

''Call the chauffeur with car.''

बशीर बाहर निकला और पाँच मिनट में स्टाफ कार किंग के ऑफिस के सामने खड़ी थी। किंग ने खुद ही कार चलाते हुए  रॉटरे के पास जाने का निश्चय किया।

सर एचिनलेक के आगमन के समय घटित घटनाओं का विवरण किंग ने रॉटरे के सम्मुख प्रस्तुत किया। रॉटरे कुछ पल सोचता रहा।

‘‘दत्त पकड़ा गया, यह तो उपलब्धि है। अब इस दत्त से ही बेस में उसके साथियों के बारे में पता करना होगा। उनकी सहायता करने वाले बाहर के लोगों को ढूँढ़ना होगा, इसलिए उसके सहकारियों पर नजर रखनी पड़ेगी।’’ रॉटरे किंग को सुझाव दे रहा था।

‘‘सर, उसे सेल में रखा है। अत्याचार करके उससे जानकारी हासिल हो सके इस उद्देश्य से मैंने रॉयल नेवी के सैनिकों को पहरे पर रखा है। अगर आप कहें तो...’’

‘‘नहीं। ऐसी जल्दबाजी और बेवकूफी मत करो। दत्त को मारे गए कोड़ों के निशान हमारी पीठ पर नजर आएँगे। ये सारा मामला हमें बड़ा महँगा पड़ेगा। यदि सैनिकों को पता चल गया कि दत्त के साथ मारपीट की गई है, तो बगावत की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता।’’  रॉटरे  ने  किंग  को  ख़तरे से आगाह किया।

‘‘फिर,   आपकी   राय   में   अब   मुझे   क्या   करना   चाहिए ?’’   किंग   ने   पूछा।

‘‘कुछ  नहीं।  तुम  मामूली  तौर  पर  पूछताछ  करो।  तब  तक  मैं  एक  जाँच कमेटी नियुक्त करता हूँ। ये कमेटी गहराई से जाँच करेगी। इसके लिए मैं चार अधिकारी नियुक्त करता हूँ, मगर तब तक दत्त पर कड़ी नजर रखो। हो सके तो उसके साथियों का पता लगाओ।’’  रॉटरे  ने  आदेशात्मक आवाज में सलाह दी।

‘‘सर, जाँच कमेटी का विचार अच्छा है। मगर इस कमेटी में कम से कम एक हिन्दुस्तानी अफ़सर को रखिये, जिससे कोई यह न कहे कि निर्णय एकतरफ़ा और बदले की भावना से लिया गया।’’   किंग ने सुझाव दिया।

‘‘तुम्हारे  सुझाव  पर  मैं  अवश्य  विचार  करूँगा।’’  रॉटरे  ने  उसे  आश्वासन दिया। किंग सन्तोष से रॉटरे के दफ़्तर से बाहर निकला।

''Hey, you bastard, come on, get up and get ready !'' गोरा पेट्टी ऑफिसर दत्त को उठा रहा था। दत्त आधी नींद में ही था।                    

''Come on, get me a cup of tea.'' दत्त ने करवट बदलते हुए माँग की।

चिढ़कर पेट्टी ऑफिसर ने गर्दन पकड़कर उसे बैठाया और बाज़ू में रखे मग का पानी उसके मुँह पर मारा। पानी की मार से दत्त हड़बड़ाकर जाग गया। उसे वास्तविकता का आभास हुआ। उसने गोरे पेट्टी ऑफिसर  की  ओर  इस  तरह देखा कि वह दत्त की नज़रों में तुच्छता के भाव को जान गया और दत्त पर चिल्लाया, "Come on, bastard. Get up‘शेर कहूँ तो भी खाएगा और शेर की औलाद कहूँ तो भी खाएगा; फिर शेर की औलाद ही क्यों न कहूँ ?’ दत्त ने सोचा और वह गोरे पेट्टी ऑफिसर पर चिल्लाया, ''you bloody white pig, can you prove that you are not a bastard? Don't dare to abuse me now.''

दत्त का अवतार देखकर पेट्टी ऑफिसर घबरा गया। हिन्दुस्तानी पहरेदारों की   नजरों   में   दत्त   के   प्रति   आदर   छलक   रहा   था।

‘अब मुझे बिना डरे धीरज से काम लेना चाहिए,  तभी सैनिक भी ढीठ होंगे। मेरे बाहर के मित्रों का बगावत करने के प्रति जोश बढ़ेगा।’ दत्त मन ही मन विचार कर रहा था। ‘किंग, साला हरामी है। उसे मेरे साथियों के नाम चाहिए, शायद। इसके लिए वह धरती–आकाश एक कर देगा; साम,  दाम,  दण्ड और भेद - सभी अपनाएगा, मगर उसे घास नहीं डालूँगा।’ उसने निश्चय किया। उसे स्वातत्र्यवीर सावरकर की याद आई, अंदमान के कोल्हू की याद आई, फाँसी के फ़न्दे उसकी आँखों के सामने नाचने लगे और वह अचानक चिल्लाया,  ‘‘वन्दे मातरम् !’’

गोरा   चीफ   उसकी   ओर   देखता   रह   गया। 

रॉटरे से मिलकर किंग सीधा अपने चेम्बर में आया। चेम्बर के बाहर सब लेफ्टिनेंट रावत इकट्ठा किए गए काग़जों का ढेर लेकर खड़ा था।

‘‘सर,  मैं सारे सबूत ले आया हूँ। हर काग़ज दत्त के विरोध में जा रहा है। उसे नौसेना से तो भगा ही दिया जाएगा, मगर साथ ही कम से कम चार सालों  का  सश्रम  कठोर  कारावास  भी  दिया  जा  सकता  है।’’  रावत  बड़े  उत्साह से   बता   रहा   था।

‘‘निर्णय मैं लेने वाला हूँ। तुम्हारा काम सिर्फ सबूत पेश करना है।’’ किंग ने रावत को डाँटा।

 ‘‘सॉरी,   सर !’’   रावत   का   चेहरा   उतर   गया।

''Now go and bring the accused.'' किंग   ने   उसे   हुक्म   दिया।

रावत चेम्बर से बाहर आया। उसने रेग्यूलेटिंग ऑफिसर को ऑर्डर दिया, ''March on the accused.''

दो पहरेदारों से घिरा दत्त धीमे कदमों से किंग के चेम्बर में प्रविष्ट हुआ। उसके पीछे रावत भी था।

दत्त शान्त था। उसके चेहरे पर किसी तरह का तनाव नहीं था। चेहरे पर अपराधीपन की छटा भी नहीं थी। वह  किंग  की  नजरों  से  नजरें  मिलाते  हुए  उसके सामने खड़ा हो गया। किंग मन ही मन दत्त पर गुस्सा कर रहा था। अपने गुस्से पर नियन्त्रण रखते हुए उसने यथासम्भव शान्ति से पूछा, ‘‘तो     तू     ही     वह     क्रान्तिकारी है ?’’

‘‘हाँ,  मैं  ही  हूँ  वह  स्वतन्त्रता  प्रेमी  आज़ाद  हिन्दुस्तानी  और  मुझे  इसका गर्व   है।’’

दत्त से इस शान्ति की और स्वीकारोक्ति की किंग ने अपेक्षा नहीं की थी। उसका अनुमान था कि दत्त आरोप को अस्वीकार करेगा; सबूत पेश करने पर गिड़गिड़ाएगा। मगर यहाँ तो बड़ी विचित्र–सी बात हो रही थी। रावत बेचैन हो गया।

‘‘कितनी सफाई से मैंने सबूत इकट्ठे किए थे और ये...’’ रावत मन में सोच रहा था।

“इससे कुछ नहीं होगा। अपने साथियों के नाम बताओ। सबूत हैं मेरे पास–––’’ रावत   गरजा।

‘‘रावत, will you please wait outside? I wish to speak to him.'' रावत   को   बीच   ही   में   रोकते   हुए   किंग   ने   उसे   बाहर   निकाला।   रावत   के   पीछे दत्त   के   साथ   आए   पहरेदार   भी   बाहर   निकल   गए।

‘‘तुम्हें   इसका   परिणाम   मालूम   है ?’’   किंग   ने   पाइप   सुलगाते   हुए   पूछा।

‘‘हाँ, मुझे परिणामों की पूरी कल्पना है। फिर भी मैंने यह सब किया है। इसमें मुझे कोई भी गलत बात नजर नहीं आती। मैं स्वतन्त्रता प्रेमी सैनिक हूँ। हिन्दुस्तान की स्वतन्त्रता के लिए मैं अपने सर्वस्व का बलिदान करने वाला हूँ।’’ दत्त शान्ति से और निडरता से कह रहा था।

दत्त के जवाब से अवाक् हुआ किंग उसकी ओर देखता ही रहा। दत्त से आगे  क्या  पूछना  चाहिए  यह  सोचते  हुए  वह  पलभर  को  चुप  हो  गया।  दत्त  ने किंग की इस मनोदशा का लाभ उठाने का निर्णय किया और सामने पड़ी कुर्सी खींचकर उस पर बैठ गया।

‘‘साले, आज तक मैंने ऐसी हिम्मत नहीं की और तू...’’ दरवाजा थोड़ा–सा खोलकर देख रहा रावत बुदबुदाया। ‘‘अरे,    वो    बेस    कमाण्डर    है।    उसकी    इजाज़त के   बगैर... कितनी मगरूरी ! कितनी   मुँहजोरी !’’

रावत से रहा नहीं गया और वह गुस्से से चेम्बर में आ गया, चिल्लाकर दत्त से बोला, ''Hey, yon bastard, come on, stand up. बगैर इजाज़त लिये किसके सामने बैठा है ?   होश में तो है ?’’

दत्त   ने   अंगारभरी   नजरों   से   रावत   की   ओर   देखा।   रावत   थोड़ा   बौखला   गया।

'You, bloody shoe licker ! ये  तेरा  रसोईघर  नहीं  है,  जैसा  चाहे  चीखने  के लिए।’’

किंग को इसकी उम्मीद नहीं थी। वह उठकर खड़ा हो गया और मेज पर हाथ मारते हुए चिल्लाया, ''Both of you shut up, and Rawat, you get lost.''  

दत्त   हँस   रहा   था।

किंग  का  गुस्सा  बेकाबू  हो  रहा  था।  किंग  की  नज़रों  से  नज़र  मिलाकर  बात करने की काले तो क्या गोरे अधिकारियों की भी हिम्मत नहीं थी। और आज ये नयी–नयी मूँछवाला छोकरा न सिर्फ नजर मिलाकर बोल रहा है, बल्कि बिना इजाज़त कुर्सी पर बैठता है ? सामान्य परिस्थिति होती तो इस उद्दाम व्यवहार के लिए   दत्त   को   कड़ी   सजा   देता।

दत्त  का  ख़याल  था  कि  किंग  चिल्लाएगा।  उसे  कुर्सी  से  उठा  देगा।  खड़े रहने की ताकीद देगा,   मगर   ऐसा   कुछ   भी   नहीं   हुआ   था।

‘‘किंग चालाक सियार है। सावधान रहना होगा,’’ दत्त ने अपने आप को सावधान   किया।

‘‘यह मामला सीधा–सादा नहीं है। यह देखने में दुबला–पतला है, मगर मन से   मजबूत   है।’’ किंग   सोच   रहा   था।

दोनों   एक–दूसरे   को   परख   रहे   थे।

‘यहाँ  डाँटने–फटकारने  से  काम  नहीं  होगा।  अपनी  चाल  बदलनी  होगी। शायद प्यार और अपनापन दिखाने से कुछ मिला तो मिलेगा।’ किंग ने मन ही मन  निश्चय  किया  और  आवाज़  में  संयम  लाते  हुए  पूछा,  ‘‘तुम्हारा  नाम  क्या  है ?’’

‘‘दत्त,   लीडिंग   टेलिग्राफिस्ट।   ऑफिशियल   नं–   6018।’’

‘‘उम्र ?’’

 ‘‘बाईस   वर्ष।’’

‘‘मतलब, मेरे बेटे जितने हो ! देखो, तुम वाकई में मेरे लिए बेटे के समान ही हो।’’   किंग   ने हँसते हुए   कहा।

''Don’t insult my father.'' किंग स्वयं की तुलना उसके पिता से करे, यह   दत्त   को   अच्छा   नहीं   लगा   था।

किंग  को  दत्त  पर  क्रोध  तो  आया,  मगर  मन  ही  मन  वह  उसकी  हिम्मत की   दाद दे रहा   था।

‘‘विश्वास  करो।  अपने  पुत्र  के  प्रति  मेरे  मन  में  जो  भावना  है,  वैसी  ही भावना  से मैं  तुम्हें  देख  रहा  हूँ,’’  किंग  ने  दत्त  के  दिल  में  उतरने  की  कोशिश जारी रखी, ‘‘मैंने तुम्हारा सर्विस डॉक्यूमेन्ट देखा है। एक भी जगह लाल निशान नहीं है। तुम एक मेहनती, ईमानदार और आज्ञाकारी सैनिक हो। आज के इस अपराध को यदि नजरअन्दाज कर दिया जाए तो तुम्हारे हाथ से एक भी गलती नहीं  हुई  है।  मेरा  ख़याल  है  कि  ये  जो  कुछ  भी  तुम्हारे  हाथों  से  हुआ  है,  वह  किसी दबाव के कारण हुआ है। तुमने किसी के कहने पर यह किया होगा। मेरे मन में तुम्हारे लिए पूरी–पूरी सहानुभूति है।” 

‘‘तुम फिर मेरा अपमान कर रहे हो’’,  दत्त चिल्लाया। ‘‘मुझे तुम्हारी सहानुभूति की कोई जरूरत नहीं है। मैंने जो कुछ भी किया है, वह भली–भाँति समझ–बूझकर और अपनी ख़ुद की जिम्मेदारी पर देश की   स्वतन्त्रता के लिए किया है, और स्वतन्त्रता की खातिर की गई हर बात पर मुझे गर्व है,’’ दत्त बहुत ज़ोर देकर   कह   रहा   था।   उसकी   आवाज   ऊँची   हो   गई   थी।

चालाक   किंग   ने   दत्त   की   बातों   पर   कोई   ध्यान   नहीं   दिया।

''Don't get excited, my boy ! cool down, cool down !'' किंग शान्त आवाज में दत्त को समझा रहा था, ‘‘देखो इन्सान के हाथों से ग़लतियाँ हो ही जाती  हैं।  तुम  भी  इन्सान  हो।  हो  गई  होगी  गलती; मगर यह ग़लती करने के लिए तुम्हें किसने उकसाया ? उसका नाम बताओ, मैं वचन देता हूँ कि तुम पर कोई भी कार्रवाई नहीं करूँगा।‘’

दत्त   चुपचाप   ही   रहा।

‘‘देखो, मुझे सही–सही जानकारी दो, सबके नाम बताओ, जब मुझे यकीन हो जाएगा कि तुम सम्राज्ञी के प्रति वफ़ादार हो तो तुम्हें अगला प्रोमोशन दे सकूँगा। तुम्हारा नाम कमीशन के लिए रिकमेंड कर सकूँगा।’’   शहद   की उँगली चटाने से दत्त का मुँह खुल जाएगा, किंग का यह अनुमान भी ग़लत निकला।

‘‘मिस्टर किंग,’’   अपने नाम के साथ ‘मिस्टर’ का सम्बोधन सुनकर किंग के चेहरे पर चिड़चिड़ाहट के लक्षण दिखाई दिये, मगर इसकी परवाह न करते हुए दत्त किंग को सुनाए जा रहा था।

‘‘मुझे  क्या  दुधमुँहा  बच्चा  समझ  रखा  है ?  मैं  देश  के  प्रति,  अपने  आन्दोलन के प्रति गद्दारी नहीं कर सकता। दिसम्बर से इस बेस में जो कुछ भी हुआ, जो नारे लिखे गए, उसके पीछे मैं और सिर्फ मैं हूँ। आर.के. मेरा साथी था। उसके असहयोग के प्रयोग के पीछे भी मैं ही था। मैंने जो कुछ भी किया उस पर मुझे गर्व है। मौका मिला तो मैं फिर से वैसा ही करूँगा।’’

दत्त पलभर को रुका। किंग अपनी बेचैनी छिपा नहीं सका। वह समझ गया कि यह लड़का थाह नहीं लगने देगा।

‘‘मुझे  आपका  प्रमोशन  नहीं  चाहिए।  मुझे  चाहिए  मेरे  देश  की  आजादी, दोगे  आजादी ?  आपके  कन्धों  पर  जो  ओहदे  दर्शाते  हुए  फीते  हैं,  कैप  पर  जो  फूलों की जंजीर है, वह मेरे देश की परतन्त्रता की बेड़ियाँ हैं। उतार फेंको उन्हें। मैं उन्हें कुत्ते के गले में पड़े हुए पट्टे से ज्यादा महत्त्व नहीं देता...।’’

'It's enough now. Get up from the chair and keep your dirty mouth shut.''किंग का गुस्सा बेकाबू हो रहा था।

‘‘मेरा उद्देश्य पूरा हुआ। बाहर खड़े पहरेदारों और सैनिकों को मैंने दिखा दिया है कि यदि हमारी अस्मिता जागृत हो तो हम गर्दन तानकर खड़े रह सकते हैं, फिर चाहे उच्च पदस्थ अधिकारी के सामने ही क्यों  न  हो।’’  दत्त  के  चेहरे पर   समाधान   था।

‘‘मेरा ख़याल है कि सब समाप्त हो गया है,’’ दत्त ने हँसते हुए कहा और बाहर जाने के लिए उठ   खड़ा हुआ।

‘‘समाप्त नहीं हुआ। अब तो असली शुरुआत हुई है ! मैं तुम्हें कल सुबह तक  का  समय  देता  हूँ।’’  किंग  की आवाज़ में चिढ़ थी। वह पलभर के लिए भी दत्त को अपने सामने बर्दाश्त नहीं कर पा रहा था।

‘‘मुझे समय नहीं चाहिए। मेरा जवाब वही है। तुम चाहे कुछ भी कर लो, वह बदलने वाला नहीं है। तुम अपनी कार्रवाई शुरू करो। You are at liberty to take any action.'' दत्त  ने  कहा।

'' I do not need any permission to take any action. Now I will teach you a good lesson.'' किंग   का   धीरज   खत्म   हो   गया   था।

''March off the accused !'' किंग चीखा।

 ‘‘इसे आज सनसेट तक धूप में ही खड़ा रखो। पानी के अलावा कुछ और मत  देना।’’  दत्त  को  ले  जा  रहे  सैनिकों  को  किंग  ने  सूचनाएँ  दीं।  पूरी  दोपहर दत्त  धूप  में  खड़ा  रहा।


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